Digital Arrest Scam: दिल्ली पुलिस ने 5 राज्यों में बचाए ₹1.53 करोड़, जानें बुजुर्गों को कैसे बनाया जा रहा था आसान शिकार
देशभर में इंटरनेट और स्मार्टफोन का दायरा जितनी तेजी से बढ़ा है, उतनी ही तेजी से शातिर साइबर ठगों ने आम नागरिकों को ठगने के नए और बेहद डरावने तरीके ईजाद कर लिए हैं। हाल के महीनों में सबसे ज्यादा चर्चा और खौफ का विषय बना 'डिजिटल अरेस्ट' (Digital Arrest) अब केवल कुछ महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक बड़े संगठित अंतरराज्यीय सिंडिकेट का रूप ले चुका है। इसी खतरे के खिलाफ दिल्ली पुलिस की स्पेशल साइबर सेल (IFSO) ने एक बड़ी और सुनियोजित कार्रवाई करते हुए 5 अलग-अलग राज्यों में ताबड़तोड़ छापेमारी की और मासूम नागरिकों की गाढ़ी कमाई के 1.53 करोड़ रुपये ठगों के खातों में ट्रांसफर होने से ऐन वक्त पर फ्रीज कराकर सुरक्षित बचा लिए। इस संयुक्त अभियान में पुलिस ने गिरोह के कई प्रमुख मास्टरमाइंडों और म्यूल बैंक अकाउंट्स का नेटवर्क चलाने वाले एजेंटों को दबोचने में भी बड़ी कामयाबी हासिल की है।
जांच में जो सबसे चौंकाने वाला और परेशान करने वाला तथ्य सामने आया है, वह यह है कि इस साइबर नेटवर्क के निशाने पर मुख्य रूप से 60 वर्ष से अधिक उम्र के सेवानिवृत्त बुजुर्ग, रिटायर्ड सरकारी अधिकारी और अकेले रहने वाली महिलाएं थीं। ठग इन वरिष्ठ नागरिकों की तकनीकी समझ की कमी और कानून के स्वाभाविक डर का मनोवैज्ञानिक फायदा उठाकर उन्हें कई-कई घंटों तक डिजिटल बंधक बनाए रखते थे और उनसे जीवन भर की जमा पूंजी, ग्रेच्युटी और पेंशन फंड के करोड़ों रुपये अपने फर्जी बैंक खातों में ट्रांसफर करवा लेते थे।
क्या है 'डिजिटल अरेस्ट' और कानून की किताबों में इसकी वास्तविक हैसियत
डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से एक संगठित फ्रॉड और मानसिक ब्लैकमेलिंग का खेल है। भारतीय कानून, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) या किसी भी अन्य संवैधानिक व्यवस्था में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई प्रावधान अस्तित्व में ही नहीं है। देश की कोई भी जांच एजेंसी—चाहे वह सीबीआई (CBI) हो, प्रवर्तन निदेशालय (ED), नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB), राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) या किसी भी राज्य की स्थानीय पुलिस—कभी भी किसी व्यक्ति को व्हाट्सएप, स्काइप या वीडियो कॉल पर न तो गिरफ्तार कर सकती है और न ही कैमरे के सामने बैठे रहने का कानूनी फरमान सुना सकती है।
इसके बावजूद, साइबर ठग तकनीकी संसाधनों का दुरुपयोग करके ऐसा आभासी माहौल तैयार करते हैं कि पीड़ित घबराहट में सही और गलत की पहचान करने की क्षमता खो बैठता है। ठग फर्जी पुलिस थानों, कोर्ट रूम्स और सीबीआई दफ्तरों के बैकड्रॉप (नकली सेटअप) का इस्तेमाल कर वीडियो कॉल करते हैं, जिससे सामान्य नागरिकों को पहली नजर में सब कुछ पूरी तरह असली और प्रामाणिक लगता है।
गिरोह का खौफनाक मॉडस ऑपरेंडी: कूरियर में ड्रग्स से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फर्जी समन तक
दिल्ली पुलिस की तफ्तीश में सामने आया कि यह गिरोह अपने शिकार को फंसाने के लिए एक बेहद परिष्कृत और पूर्व-नियोजित पटकथा (Script) पर काम करता था। ठगी की शुरुआत आमतौर पर एक ऑटोमेटेड आईवीआर कॉल या सामान्य फोन कॉल से होती थी। फोन करने वाला खुद को किसी मशहूर अंतरराष्ट्रीय कूरियर कंपनी (जैसे FedEx या DHL), कस्टम विभाग या दूरसंचार विभाग का प्रतिनिधि बताता था।
शिकार को फोन पर अचानक बताया जाता था कि उसके आधार कार्ड और मोबाइल नंबर का उपयोग करके ताइवान, कंबोडिया या दुबई के लिए एक अवैध पार्सल भेजा जा रहा था, जिसे मुंबई या दिल्ली एयरपोर्ट पर कस्टम अधिकारियों ने जब्त कर लिया है। घबराए हुए बुजुर्ग को बताया जाता था कि उस पार्सल में 5 जाली पासपोर्ट, 150 ग्राम एमडीएमए (ड्रग्स) और कई प्रतिबंधित सिम कार्ड बरामद हुए हैं। जैसे ही पीड़ित यह कहता कि उसने ऐसा कोई पार्सल नहीं भेजा, ठग बेहद शातिर तरीके से सहानुभूति दिखाते हुए कहते थे, "लगता है आपकी पहचान चुराकर (Identity Theft) किसी बड़े आतंकी या ड्रग सिंडिकेट ने यह काम किया है, इसलिए हम आपकी कॉल सीधे पुलिस हेडक्वार्टर ट्रांसफर कर रहे हैं।"
कॉल ट्रांसफर होते ही स्क्रीन पर पुलिस की वर्दी पहने, नेमप्लेट और वॉकी-टॉकी लिए एक फर्जी पुलिस इंस्पेक्टर या डीसीपी प्रकट होता था। वह पीड़ित को डराने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग, टेरर फंडिंग और मानव तस्करी जैसी गैर-जमानती धाराओं का हवाला देता था। इसके बाद पीड़ित के फोन पर सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और सीबीआई के फर्जी सील-मुहर लगे 'अरेस्ट वारंट' और 'संपत्ति जब्ती आदेश' की पीडीएफ फाइलें भेज दी जाती थीं। पीड़ित को धमकाया जाता था कि वह किसी से बात न करे, कमरे का दरवाजा बंद कर ले और 24 से 48 घंटे तक कैमरे के सामने ही रहे, जिसे वे 'डिजिटल कस्टडी' कहते थे। अंत में, "आपके पैसों की कानूनी वैधता की जांच" के नाम पर सारा पैसा सरकारी सुरक्षा खाते (Government Escrow Account) के नाम पर फर्जी खातों में ट्रांसफर करवा लिया जाता था।
5 राज्यों में दिल्ली पुलिस का बड़ा एक्शन: म्यूल अकाउंट्स और इंटरनेशनल लिंक का भंडाफोड़
दिल्ली के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक की शिकायत पर जब स्पेशल सेल ने तकनीकी जांच शुरू की, तो पैसों के तार कई राज्यों में फैले मिले। साइबर सेल की टीमों ने दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और पश्चिम बंगाल में एक साथ सुनियोजित छापेमारी की। पुलिस ने वित्तीय खुफिया इकाइयों और बैंकों के नोडल अधिकारियों के साथ त्वरित समन्वय स्थापित किया।
जिस समय ठग बुजुर्ग से हड़पे गए 1.53 करोड़ रुपये को एटीएम से निकालने और क्रिप्टो करेंसी व हवाला के जरिए देश से बाहर भेजने की फिराक में थे, ठीक उसी समय पुलिस की टीम ने दर्जनों 'म्यूल अकाउंट्स' (दूसरों के नाम पर खोले गए फर्जी बैंक खाते) को डिजिटल रूप से फ्रीज कर दिया। जांच में यह भी सामने आया कि इस गिरोह के मास्टरमाइंड दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों जैसे म्यांमार और कंबोडिया के साइबर स्कैम हब्स में बैठे विदेशी सिंडिकेट्स के सीधे संपर्क में थे और भारत में सक्रिय एजेंटों को केवल कमिशन के आधार पर खाते उपलब्ध कराने का काम सौंपा गया था।
डिजिटल अरेस्ट के जाल से खुद को और अपने परिवार को बचाने के 5 अचूक मंत्र
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी अज्ञात कॉल पर भयभीत होने के बजाय सामान्य कानूनी प्रक्रिया और विवेक का इस्तेमाल करें:
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कानून को समझें, वीडियो कॉल पर अरेस्ट नहीं होता: हमेशा याद रखें कि भारत का कोई भी पुलिस अधिकारी, कस्टम अधिकारी या जज वीडियो कॉल पर बयान दर्ज नहीं करता और न ही किसी को डिजिटल रूप से अरेस्ट करता है। गिरफ्तारी के लिए पुलिस को व्यक्तिगत रूप से वारंट के साथ आना होता है।
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कैमरे के सामने बैठने से साफ इनकार करें: यदि कोई आपको वीडियो कॉल पर वर्दी दिखाकर धमकाने की कोशिश करे, तो तुरंत कॉल काट दें। किसी भी सूरत में कैमरे के सामने न बैठें और न ही अपने कमरे को बंद करें।
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'वेरिफिकेशन' के नाम पर कभी पैसा न भेजें: कोई भी सरकारी विभाग, आरबीआई या सीबीआई कभी भी आपकी संपत्ति या बैंक बैलेंस को 'वेरिफाई' करने के लिए अपने खातों में पैसा ट्रांसफर करने के लिए नहीं कहती। यदि कोई खाते में पैसा भेजने की मांग करे, तो वह 100% फ्रॉड है।
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परिवार और परिचितों से तुरंत साझा करें: ठगों की पहली चाल पीड़ित को सामाजिक रूप से अलग-थलग (Isolate) करने की होती है ताकि वह किसी से सलाह न ले सके। ऐसी कोई भी कॉल आने पर तुरंत अपने परिवार के सदस्यों, बच्चों या नजदीकी दोस्तों को पूरी बात बताएं।
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हेल्पलाइन 1930 और लोकल थाने का सहारा लें: यदि आपको कोई संदिग्ध कॉल आए, तो बिना एक पल गंवाए भारत सरकार के राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें या चौबीसों घंटे चालू रहने वाली साइबर हेल्पलाइन संख्या 1930 पर तुरंत कॉल करें। आप तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर भी स्थिति की पुष्टि कर सकते हैं। जागरूकता और तुरंत उठाया गया साहसिक कदम ही इस डिजिटल आतंक का सबसे मजबूत बचाव है।