कोरोना, यूक्रेन युद्ध और अब गहराता ऊर्जा संकट: क्या सबसे बुरे और मुश्किल दौर से गुजर रहा है आधुनिक यूरोप

कोरोना, यूक्रेन युद्ध और अब गहराता ऊर्जा संकट: क्या सबसे बुरे और मुश्किल दौर से गुजर रहा है आधुनिक यूरोप

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतिहास पर नजर डालें तो शायद ही कभी आधुनिक यूरोप ने एक साथ इतने गंभीर, बहुआयामी और गहरे संकटों का सामना किया हो जितना कि वह पिछले कुछ वर्षों से कर रहा है। वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल का दौर तब शुरू हुआ जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की भयानक मार से जूझ रही थी, और जैसे-तैसे दुनिया इस स्वास्थ्य आपदा से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी, वैसे ही यूरोप के दरवाजे पर रूस-यूक्रेन युद्ध ने दस्तक दे दी। इस भू-राजनीतिक संघर्ष ने यूरोप की रीढ़ कहे जाने वाले ऊर्जा तंत्र को हिलाकर रख दिया, जिसके परिणामस्वरुप महाद्वीप में इतिहास का सबसे भीषण ऊर्जा संकट पैदा हो गया। आज हालत यह है कि उद्योगपतियों से लेकर आम नागरिकों तक हर कोई आसमान छूती बिजली और गैस की कीमतों से त्रस्त है, और विशेषज्ञों का यह मानना है कि यह दशक यूरोप के लिए अब तक का सबसे खराब और चुनौतीपूर्ण दशक साबित हो रहा है।

महामारी की मार से उबरे भी नहीं थे कि आ धमका यूक्रेन युद्ध का साया

जब साल 2020 में कोरोना वायरस महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लिया, तो यूरोपीय संघ के देश भी इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभावों से बच नहीं सके। लॉकडाउन, सप्लाई चेन का टूटना और वैश्विक व्यापार में आई भारी गिरावट ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को पहले ही आईसीयू में ला खड़ा कर दिया था। इस आर्थिक मंदी से उबरने की जद्दोजहद चल ही रही थी कि फरवरी 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध ने यूरोपीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के समीकरणों को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया। यूरोपीय देश जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बहुत हद तक रूस पर निर्भर थे, अचानक से एक बड़े भू-राजनीतिक अवरोध के सामने खड़े हो गए। इस युद्ध ने केवल क्षेत्रीय शांति को ही भंग नहीं किया, बल्कि वैश्विक स्तर पर महंगाई, खाद्यान्न की कमी और कच्चे तेल के दामों में ऐसी आग लगाई कि पूरे यूरोप में हाहाकार मच गया।

ऊर्जा संकट का भयंकर रूप: कैसे गैस और बिजली की कमी ने बढ़ाई यूरोप की चिंता

यूरोप के इस वर्तमान संकट के केंद्र में मुख्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा की विफलता रही है। रूस द्वारा गैस आपूर्ति रोके जाने या उसमें भारी कटौती किए जाने के बाद से यूरोपीय देशों को सर्दियों के मौसम में घरों को गर्म रखने और कारखानों को चलाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी। प्राकृतिक गैस और कोयले की कीमतों में हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने बिजली उत्पादन की लागत को कई गुना बढ़ा दिया। इसके चलते जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और इटली जैसे ताकतवर यूरोपीय देशों में भी ऊर्जा राशनिंग और ब्लैकआउट जैसी स्थितियों का डर सताने लगा। भारी उद्योगों को या तो अपना उत्पादन कम करना पड़ा या फिर उन्हें अपनी यूनिट्स को महंगे ऊर्जा विकल्पों के चलते बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिससे महाद्वीप में औद्योगिकीकरण की गति को करारा झटका लगा है।

महंगाई का ऐतिहासिक रिकॉर्ड और आम जनजीवन पर पड़ रहा गहरा आर्थिक असर

ऊर्जा संकट का सीधा और सबसे घातक असर आम यूरोपीय नागरिकों की जेब पर पड़ा है। महंगाई दर दशकों के अपने सबसे ऊपरी स्तर पर पहुंच गई, जिससे ग्रॉसरी, परिवहन और मकान का किराया चुकाना भी मध्यम वर्ग के लिए बेहद कठिन हो गया। लोगों की क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई है और वेतन में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई जिस तेजी से जीवनयापन की लागत बढ़ी है। कई यूरोपीय देशों में सरकारों के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं, क्योंकि लोग बढ़ते बिजली बिलों और महंगाई से राहत की मांग कर रहे हैं। इस आर्थिक तंगी ने यूरोपीय संघ की सरकारों के सामने एक अजीब दुविधा पैदा कर दी है कि वे एक तरफ तो यूक्रेन युद्ध के लिए सैन्य और वित्तीय मदद जारी रखें और दूसरी तरफ अपने ही नागरिकों को घरेलू महंगाई से बचाएं।

क्या यह सचमुच यूरोप का सबसे खराब दशक है और भविष्य की चुनौतियां क्या हैं?

आर्थिक विश्लेषकों और वैश्विक मामलों के जानकारों का मानना है कि जिस प्रकार की अनिश्चितताएं इस दशक में यूरोप को घेर रही हैं, वैसी स्थिति पिछले कई दशकों में देखने को नहीं मिली थी। जलवायु परिवर्तन के दबाव के बीच जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने और रिन्यूएबल एनर्जी की ओर शिफ्ट होने की जल्दबाजी ने भी इस संकट को हवा दी है। हालांकि यूरोपीय देशों ने अब एलएनजी के वैकल्पिक स्रोतों और हरित ऊर्जा में निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया है, लेकिन रूस पर निर्भरता खत्म करने की इस प्रक्रिया में जो आर्थिक कीमत चुकानी पड़ रही है, उसने महाद्वीप की विकास दर को सुस्त कर दिया है। अंततः यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या यूरोप अपनी पारंपरिक मजबूत आर्थिक नीतियों और कूटनीति के दम पर इस अभूतपूर्व दौर से बाहर निकल पाता है या फिर यह संकट उसकी वैश्विक महाशक्ति वाली छवि को लंबे समय के लिए प्रभावित करेगा।