चीनी आयात पर केंद्र का बड़ा फैसला: TRQ के तहत ड्यूटी-फ्री नियमों में ढील, 31 दिसंबर तक बिना शुल्क कच्ची चीनी मंगा सकेंगी रिफाइनरियां

चीनी आयात पर केंद्र का बड़ा फैसला: TRQ के तहत ड्यूटी-फ्री नियमों में ढील, 31 दिसंबर तक बिना शुल्क कच्ची चीनी मंगा सकेंगी रिफाइनरियां

देश के चीनी उद्योग और खुदरा बाजार में मिठास बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला लिया है। घरेलू बाजार में कीमतों को काबू में रखने और त्योहारी सीजन के बाद भी बाजार में आपूर्ति की कोई कमी न हो, इसके मद्देनजर वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) ने टैरिफ रेट कोटा यानी टीआरक्यू के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। इस नए आदेश के तहत देश की रिफाइनरियों को 31 दिसंबर तक बिना किसी कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) के कच्ची चीनी का आयात करने की सीधी मंजूरी मिल गई है। सरकार के इस रणनीतिक कदम से न केवल घरेलू स्तर पर चीनी की कीमतों में संभावित उछाल पर ब्रेक लगेगा, बल्कि बंदरगाहों के पास स्थित बड़ी रिफाइनिंग इकाइयों को भी अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग करने में मदद मिलेगी।

TRQ नियमों में बदलाव और सरकार की नई अधिसूचना

डीजीएफटी द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, टैरिफ रेट कोटा व्यवस्था के तहत तय मात्रा में कच्ची चीनी का ड्यूटी-फ्री आयात अब 31 दिसंबर तक पूरी तरह वैध रहेगा। पहले लागू प्रावधानों के तहत आयातकों और मिलर्स के सामने कई तरह की समयसीमा और प्रशासनिक शर्तें थीं, जिससे बंदरगाहों पर खेप फंसने का खतरा बना रहता था। अब नियमों को लचीला बनाकर यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जिन इकाइयों को टीआरक्यू के तहत कोटा आवंटित किया गया है, वे साल के अंत तक बिना कोई बेसिक कस्टम ड्यूटी चुकाए कच्ची चीनी भारत ला सकती हैं। वाणिज्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह कदम वैश्विक बाजार में कच्चे माल की उपलब्धता और भारत के घरेलू स्टॉक की समीक्षा के बाद उठाया गया है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित संकट से पहले ही पर्याप्त बफर तैयार रखा जा सके।

घरेलू आपूर्ति और त्योहारी सीजन के बाद कीमतों पर असर

भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में से एक है और यहां हर साल त्योहारी सीजन के दौरान मिठास की मांग अपने चरम पर पहुंच जाती है। हालांकि त्योहारी मांग के बाद भी शादी-ब्याह और शीतकालीन खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में चीनी की भारी खपत होती है। ऐसे में यदि खुले बाजार में आपूर्ति थोड़ी भी लड़खड़ाती है, तो इसका सीधा असर खुदरा कीमतों पर पड़ता है। सरकार के इस ताजा फैसले से बाजार में साफ संकेत गया है कि देश में चीनी का कोई संकट नहीं होने दिया जाएगा। थोक बाजारों में सट्टेबाजी और जमाखोरी की संभावनाओं पर भी इससे पूरी तरह लगाम लगेगी। जब रिफाइनरियां सस्ते में कच्चा माल आयात कर उसे प्रोसेस्ड चीनी में बदलेंगी, तो खुदरा बाजार में कीमतें 38 से 44 रुपये प्रति किलोग्राम के सामान्य दायरे में स्थिर बनी रहेंगी।

कोस्टल रिफाइनरियों और प्रोसेसिंग प्लांट्स को मिली बड़ी संजीवनी

गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे तटीय राज्यों में स्थित विशाल रिफाइनिंग प्लांट्स के लिए यह नीतिगत बदलाव एक बड़ी राहत बनकर आया है। ये रिफाइनरियां मुख्य रूप से ब्राजील और थाईलैंड जैसे प्रमुख उत्पादक देशों से आयातित कच्ची चीनी को प्रोसेस करके घरेलू बाजार में आपूर्ति करती हैं या फिर उसका मूल्य संवर्धन कर निर्यात करती हैं। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक लॉजिस्टिक्स लागत और शिपिंग फ्रेट में उतार-चढ़ाव के कारण इन इकाइयों पर परिचालन का दबाव बढ़ रहा था। अब 31 दिसंबर तक ड्यूटी-फ्री खिड़की खुली रहने से ये इकाइयां अपने आपूर्ति चक्र को बेहतर ढंग से प्लान कर सकेंगी। मिल संचालकों का कहना है कि ड्यूटी छूट मिलने से उनकी इनपुट लागत घटेगी और वे पूरी क्षमता से काम कर सकेंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को भी गति मिलेगी।

एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम और गन्ना किसानों का समीकरण

इस फैसले का एक दूसरा और बेहद महत्वपूर्ण पहलू देश का एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (ईबीपी) है। भारत सरकार पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। घरेलू चीनी मिलों का एक बड़ा हिस्सा गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे को सीधे एथेनॉल उत्पादन में डाइवर्ट कर रहा है। जब देश की प्रमुख घरेलू मिलें ग्रीन एनर्जी की ओर अधिक गन्ना डायवर्ट करती हैं, तो खाद्य श्रेणी की चीनी का उत्पादन सीमित होने का जोखिम रहता है। टीआरक्यू के तहत कच्ची चीनी का आयात खोलकर सरकार ने एक संतुलन साधने की कोशिश की है। इससे एक तरफ ग्रीन फ्यूल के लिए गन्ने का उपयोग जारी रहेगा और दूसरी तरफ आम जनता की रसोई में चीनी की किल्लत नहीं होगी। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के गन्ना किसानों को भी इसका फायदा यह होगा कि मिलों की वित्तीय तरलता बनी रहेगी, जिससे उनके गन्ने के बकाये का भुगतान समय पर हो सकेगा।

अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति और भारत का रणनीतिक रुख

वैश्विक स्तर पर चीनी उत्पादन का परिदृश्य ब्राजील के मौसम और थाईलैंड की फसलों पर काफी हद तक निर्भर करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चीनी के वायदा भाव में हाल के दिनों में कई बार उतार-चढ़ाव देखा गया है। ऐसे समय में भारत द्वारा टीआरक्यू के तहत 31 दिसंबर तक की तय विंडो देना एक सोचा-समझा कूटनीतिक और आर्थिक कदम है। भारतीय आयातक अब अनुकूल वैश्विक कीमतों का लाभ उठाकर तुरंत अनुबंध कर सकते हैं। इसके अलावा, भारत सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि आयात की जाने वाली खेप केवल उन्हीं मानकों पर आधारित हो जो घरेलू उद्योग के हितों को नुकसान न पहुंचाएं। आयातित कच्ची चीनी को रिफाइन करके घरेलू आपूर्ति चेन में जोड़ने की प्रक्रिया को अब कागजी औपचारिकताओं से मुक्त कर सिंगल-विंडो निगरानी में लाया गया है।

आम उपभोक्ता और मिष्ठान्न उद्योग के लिए क्या हैं मायने

आने वाले महीनों में सर्दियों और शादियों के सीजन के चलते हलवाइयों, बेकरी, पैकेज्ड फूड कंपनियों और शीतल पेय निर्माताओं की ओर से भारी मांग निकलने वाली है। यदि चीनी के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर इन सभी क्षेत्रों की उत्पादन लागत पर पड़ता है, जिससे आम आदमी की जेब ढीली होती है। ड्यूटी-फ्री आयात से थोक सप्लायरों को राहत मिलेगी और थोक रेट नियंत्रित रहेंगे। जब थोक बाजार में दरें स्थिर रहती हैं, तो इसका सीधा फायदा आम किराना दुकानों पर खरीदारी करने वाले मध्यम वर्ग को मिलता है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह नीति महंगाई दर (सीपीआई) को भी नियंत्रित रखने में भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के प्रयासों को मजबूत समर्थन प्रदान करेगी।