Auto Facts: शुरुआत में सफेद रंग के ही होते थे गाड़ियों के टायर, जानिए फिर क्यों और कैसे ये पूरी तरह हो गए काले

Auto Facts: शुरुआत में सफेद रंग के ही होते थे गाड़ियों के टायर, जानिए फिर क्यों और कैसे ये पूरी तरह हो गए काले

लखनऊ। आज हम सड़कों पर दौड़ती किसी भी गाड़ी—चाहे वह चमचमाती स्पोर्ट्स कार हो, हैवी ट्रक हो या फिर एक साधारण साइकिल—को देखें, तो एक चीज सभी में बिल्कुल समान नजर आती है, और वह है टायरों का काला रंग (Black Tyres)। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऑटोमोबाइल के शुरुआती इतिहास में गाड़ियों के टायर काले नहीं, बल्कि पूरी तरह सफेद हुआ करते थे? जी हां, 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में सड़कों पर चलने वाली विंटेज कारों में सफेद रंग के ही टायर लगे होते थे। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और विज्ञान के मुताबिक, टायरों के सफेद से काले होने का यह सफर कोई फैशन या दिखावे का बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक कारण और गाड़ियों की सुरक्षा का फॉर्मूला छिपा हुआ है।

 

शुरुआत में सफेद क्यों होते थे टायर?

प्राकृतिक रबर (Natural Rubber) का असली रंग दूधिया सफेद (Milky White) होता है। जब शुरुआत में रबर से टायर बनाने की तकनीक विकसित हुई, तो उसमें कोई अतिरिक्त रंग या तत्व नहीं मिलाया जाता था। रबर को मजबूती देने के लिए उसमें केवल जिंक ऑक्साइड (Zinc Oxide) का इस्तेमाल किया जाता था, जिसके कारण टायरों का रंग पूरी तरह सफेद या मटमैला दिखाई देता था। हालांकि, ये शुरुआती सफेद टायर बहुत ज्यादा टिकाऊ नहीं थे। ये जल्दी घिस जाते थे, धूप की वजह से इनमें दरारें आ जाती थीं और सड़कों पर चलते समय ये बहुत जल्दी गंदे भी हो जाते थे।

1917 का वो ऐतिहासिक बदलाव: 'कार्बन ब्लैक' की एंट्री

टायरों को लंबे समय तक टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने लगातार कई शोध किए। इसी कड़ी में साल 1917 के आसपास टायर निर्माता कंपनियों ने एक क्रांतिकारी खोज की। उन्होंने टायर बनाने वाले रबर के मिश्रण में 'कार्बन ब्लैक' (Carbon Black) नाम का एक रासायनिक पदार्थ मिलाना शुरू किया। कार्बन ब्लैक मूल रूप से पेट्रोलियम उत्पादों के जलने से निकलने वाला एक महीन काला पाउडर होता है। रबर में इस कार्बन ब्लैक को मिलाते ही टायरों का रंग हमेशा के लिए पूरी तरह काला हो गया।

 

टायरों में कार्बन ब्लैक मिलाने के 3 सबसे बड़े फायदे

  • 1. कई गुना बढ़ गई टायरों की मजबूती (Durability): वैज्ञानिकों के अनुसार, साधारण सफेद रबर के टायर जहां मुश्किल से 8,000 से 10,000 किलोमीटर ही चल पाते थे, वहीं कार्बन ब्लैक मिलने के बाद टायरों की उम्र लगभग 60,000 से 80,000 किलोमीटर तक बढ़ गई। यह रबर के धागों (Polymers) को आपस में मजबूती से बांध देता है, जिससे टायर सड़कों के घर्षण (Friction) को आसानी से झेल लेते हैं।

  • 2. गर्मी और यूवी किरणों (UV Rays) से सुरक्षा: गाड़ियां जब तेज रफ्तार में चलती हैं, तो सड़क और टायर के बीच भारी घर्षण के कारण टायरों का तापमान बहुत बढ़ जाता है। कार्बन ब्लैक एक बेहतरीन 'हीट डिस्पेंसर' का काम करता है, जो टायर की गर्मी को सोखकर उसे समान रूप से फैला देता है। इसके अलावा, यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों से रबर को सड़ने या हार्ड होने से बचाता है।

  • 3. बेहतर रोड ग्रिप और सेफ्टी: काले टायरों की सड़क पर पकड़ (Road Grip) सफेद टायरों के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत होती है। यह गाड़ियों को मोड़ों पर पलटने से बचाता है और ब्रेक लगाने पर गाड़ी को तुरंत रोकने में मदद करता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा काफी कम हो जाता है।

व्हाइट वॉल टायर्स (White Wall Tyres) का दौर

काले टायरों के आने के बाद भी, 1930 और 1950 के दशक के बीच 'व्हाइट वॉल टायर्स' का एक नया फैशन ट्रेंड चला। इसमें टायर का मुख्य हिस्सा तो मजबूत काले रबर का ही होता था, लेकिन उसके बाहरी किनारे (Sidewalls) पर सफेद रबर की एक पट्टी लगा दी जाती थी। उस दौर में ऐसी गाड़ियां अमीरी और स्टेटस सिंबल मानी जाती थीं। हालांकि, रखरखाव में भारी कठिनाई और आधुनिक कारों के बदलते डिजाइन के कारण धीरे-धीरे यह फैशन भी पूरी तरह खत्म हो गया और आज दुनिया भर में केवल 100% ब्लैक टायर ही स्टैंडर्ड बन चुके हैं।

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