रूस, यूक्रेन और जर्मनी की बालाओं ने भारतीय परंपरा निभाते हुए साड़ी पहनकर किया पिंडदान

रूस, यूक्रेन और जर्मनी की बालाओं ने भारतीय परंपरा निभाते हुए साड़ी पहनकर किया पिंडदान

सनातन संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं और मोक्ष की भूमि कहे जाने वाले बिहार के ऐतिहासिक गया (Gaya) शहर से इस वक्त एक ऐसी अद्भुत, अलौकिक और हृदय को छू लेने वाली तस्वीर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। पितृपक्ष मेला (Pitru Paksha Mela) के इस पवित्र और महात्म्य से भरे अवसर पर जब गया के फल्गु तट और विष्णु पद मंदिर परिसर में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है, तब वहां एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसने हर किसी को अचंभित कर दिया। रूस (Russia), यूक्रेन (Ukraine), जर्मनी (Germany), इटली और अफ्रीकी देशों से चलकर भारत आई विदेशी महिलाओं ने अपनी पश्चिमी संस्कृति को पीछे छोड़कर पूरी तरह से भारतीय रंग में रंगते हुए पारंपरिक साड़ियां पहनीं और गयाजी की पवित्र धरती पर अपने पूर्वजों तथा दिवंगत आत्माओं की मुक्ति के लिए पिंडदान (Pind Daan) किया। हाथों में कुशा, तिल और जौ लेकर विधि-विधान से तर्पण करती इन विदेशी महिलाओं के चेहरों पर जो भाव और समर्पण दिखाई दे रहा था, वह यह साबित करने के लिए काफी था कि भारतीय सनातन संस्कृति की जड़ें और इसकी आध्यात्मिक ऊर्जा पूरी दुनिया में किस कदर समाई हुई है। आज के इस विस्तृत, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण आलेख में हम आपको गयाजी की इस अद्भुत घटना, विदेशी महिलाओं के इस अनोखे सफर और पितृपक्ष के इस पावन पर्व के सभी रोमांचक पहलुओं के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

गयाजी के पवित्र फल्गु तट पर विदेशी महिलाओं का भारतीय पारंपरिक अंदाज में आगमन

बिहार का गया शहर दुनिया भर में केवल एक ऐसा स्थान माना जाता है जहां जीवित रहते हुए या मरने के बाद अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। पितृपक्ष के इन पंद्रह दिनों में महासंगम जैसा माहौल होता है जहां लाखों लोग देश के कोने-कोने से अपने पूर्वजों को नमन करने आते हैं। लेकिन इस बार गयाजी की इन पावन गलियों में विदेशी सैलानियों और आध्यात्मिक खोजियों की मौजूदगी ने इस मेले के स्वरूप को एक वैश्विक और ऐतिहासिक आयाम दे दिया है। रूस, यूक्रेन, जर्मनी, इटली और अफ्रीका जैसे दूरदराज के देशों से आई इन महिलाओं ने जब गयाजी की सीमा में प्रवेश किया, तो उन्होंने स्थानीय परंपराओं का सम्मान करते हुए खुद को पूरी तरह से भारतीय परिधान यानी पारंपरिक साड़ियों में ढाल लिया। कोई लाल तो कोई पीली और हरी साड़ियों में सजी ये विदेशी महिलाएं जब फल्गु नदी के तट पर पहुंचीं, तो स्थानीय लोग भी उनके इस आदर भाव और भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम को देखकर हतप्रद रह गए।

रूस, यूक्रेन और जर्मनी की बालाओं ने विधि-विधान से किया पिंडदान और तर्पण

सनातन संस्कृति और वेदों के ज्ञान से प्रभावित होकर भारत आईं इन विदेशी महिलाओं ने गया के पंडाजी और विद्वान पुरोहितों के सानिध्य में बैठकर अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए पूरी श्रद्धा के साथ पिंडदान की रस्म निभाई। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, आत्मा की शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए पिंडदान का जो अनुष्ठान किया जाता है, उसे इन विदेशी महिलाओं ने मंत्रोच्चार के बीच पूरी तल्लीनता से पूरा किया। फल्गु नदी के रेत पर बैठकर जब रूस और यूक्रेन की इन बालाओं ने अपने हाथों में पिंड लेकर उसका तर्पण किया और पुरखों की मुक्ति के लिए प्रार्थना की, तो उनकी आंखें नम हो गईं। कई महिलाओं ने बातचीत के दौरान यह साझा किया कि भले ही वे जन्म से किसी अन्य संस्कृति में पली-बढ़ी हों, लेकिन भारत की यह आध्यात्मिक भूमि और गयाजी की ऊर्जा उन्हें अपने भीतर एक अजीब सी शांति और अपनापन का अहसास कराती है।

पितृपक्ष मेले की वैश्विक पहचान और दुनिया भर में गूंजता गयाजी का नाम

गयाजी के पितृपक्ष मेले का यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम की भावना किस प्रकार पूरी दुनिया को आपस में पिरो रही है। युद्ध, संकट और आधुनिक दुनिया की भौतिक भागदौड़ से दूर जब जर्मनी, इटली और अफ्रीकी देशों के नागरिक भारत आकर मोक्ष नगरी में अपने पितरों को याद करते हैं, तो यह भारतीय संस्कृति की वैश्विक विजय का प्रतीक बन जाता है। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग द्वारा भी विदेशी पर्यटकों के लिए इस बार सुरक्षा, आवास और मार्ग दर्शन के विशेष इंतजाम किए गए हैं ताकि वे बिना किसी परेशानी के इस महान धार्मिक आयोजन का हिस्सा बन सकें। जब विदेशी नागरिक गया के पंडा समाज के साथ बैठकर पारंपरिक रीति-रिवाजों को सीखते और निभाते हैं, तो देश और दुनिया के बीच की दूरियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

मानवीय संवेदनाओं और सनातन आस्था का यह संगम हमेशा रहेगा अमर

गयाजी की इस धरती पर रूस, यूक्रेन और अन्य यूरोपीय तथा अफ्रीकी देशों की महिलाओं द्वारा किया गया यह पिंडदान इस बात की गवाही देता है कि आत्मा, परमात्मा, पूर्वजों के प्रति सम्मान और मोक्ष की यह परिकल्पना किसी भौगोलिक सीमा में बंधी हुई नहीं है। सरहदों और युद्धों के बीच एक-दूसरे के खिलाफ खड़े रहने वाले देशों के नागरिक जब भारत की इस पावन भूमि पर आकर एक ही घाट पर बैठकर शांति और अपनेपन की प्रार्थना करते हैं, तो यह पूरी मानवता के लिए एक बहुत बड़ा संदेश बन जाता है। पितृपक्ष के इस पावन पर्व पर इन विदेशी महिलाओं की सहभागिता ने यह साबित कर दिया है कि भारत की संस्कृति में वह जादुई आकर्षण है जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है। गयाजी के इतिहास के पन्नों में यह आयोजन हमेशा के लिए एक ऐसी अनूठी और सुनहरी याद के रूप में दर्ज हो गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को सांस्कृतिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाओं का पाठ पढ़ाता रहेगा।