जमुई की घटना को 'छिटपुट' बताने वाले इन सरकारी चेहरों को बेनकाब करना क्यों जरूरी

जमुई की घटना को 'छिटपुट' बताने वाले इन सरकारी चेहरों को बेनकाब करना क्यों जरूरी

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती और जिम्मेदारी यह होती है कि सत्ता के सिंहासन पर बैठे जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक नुमाइंदे आम जनता के दुख-दर्द और सुरक्षा के प्रति पूरी तरह संवेदनशील रहें। देश के किसी भी कोने में जब कोई आपराधिक वारदात, हिंसा या मानवीय त्रासदी घटित होती है, तो पीड़ित परिवार और पूरा समाज न्याय की उम्मीद भरी नजरों से सरकार और प्रशासन की ओर देखता है। लेकिन तब क्या हो जब संकट की इस घड़ी में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग जनता के जख्मों पर मरहम लगाने के बजाय संवेदनहीनता की हदें पार करते हुए एक गंभीर और बड़े अपराध को महज 'छिटपुट घटना' करार देकर खारिज करने की कोशिश करें? बिहार के जमुई जिले से हाल ही में एक ऐसी ही झकझोर देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। जमुई की उस खौफनाक वारदात को जब स्थानीय प्रशासन और कुछ सत्ताधारी चेहरों ने मीडिया के सामने आकर मामूली या छिटपुट बताकर रफा-दफा करने का प्रयास किया, तो जनता का आक्रोश फूट पड़ा। आइए आज इस लेख के माध्यम से विस्तार से जानते हैं कि वे कौन से सरकारी चेहरे हैं जिन्होंने जमुई की घटना को कमतर आंकने की भूल की और क्यों उनके इस गैर-जिम्मेदाराना रवैये के खिलाफ पूरा देश आज सवाल खड़े कर रहा है।

बिहार के जमुई जिले में घटी उस सनसनीखेज वारदात ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि पूरे राज्य की कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी। एक तरफ जहां पीड़ित परिवार न्याय और सुरक्षा की गुहार लगा रहा था, वहीं दूसरी तरफ अपराधियों के हौसले बुलंद थे। इस प्रकार की गंभीर घटनाओं के बाद जब उम्मीद यह की जाती थी कि पुलिस और प्रशासन तुरंत ऐक्शन मोड में आकर आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजेंगे और पीड़ित पक्ष को सांत्वना देंगे, ठीक इसके विपरीत सरकारी तंत्र का रवैया पूरी तरह उदासीन नजर आया। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने बिना किसी संवेदनशीलता के मीडिया और आम जनता के सामने बयानबाजी करते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि इस घटना को तूल न दिया जाए क्योंकि यह कोई बहुत बड़ी साजिश नहीं बल्कि एक छिटपुट घटना भर थी। इस तरह के बयानों ने आग में घी डालने का काम किया और जनता के भीतर यह संदेश गया कि सरकार अपराधियों को बचाने के लिए लीपापोती करने में जुटी हुई है, जिससे आम लोगों का प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा तेजी से उठने लगा है।

जब किसी राज्य में कानून-व्यवस्था चरमराने लगती है और अपराधियों का खौफ आम आदमी की जिंदगी पर हावी होने लगता है, तो जनता की नजरें हमेशा उन प्रशासनिक और राजनीतिक चेहरों पर टिकी होती हैं जो सुरक्षा की गारंटी देने की कसम खाकर कुर्सी पर बैठते हैं। जमुई की इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जिन अधिकारियों और नेताओं ने इसे मामूली बताकर टालने की कोशिश की, उनके चेहरे और बयान अब सोशल मीडिया से लेकर आम चौपालों तक चर्चा का विषय बन चुके हैं। जनता का सवाल यह है कि यदि किसी नागरिक पर अत्याचार होता है, उसे प्रताड़ित किया जाता है या न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है, तो क्या वह सरकार की नजरों में केवल एक छिटपुट आंकड़ा बनकर रह गया है? जब जिम्मेदार लोग ही अपराध की गंभीरता को कम करके आंकने लगते हैं, तो इससे अपराधियों के हौसले और अधिक बुलंद हो जाते हैं और वे बेखौफ होकर वारदातों को अंजाम देते हैं। जनता के भीतर इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि संकट के समय जनप्रतिनिधियों को उनका साथ देना चाहिए था, वे अपराधियों के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में यह एक बेहद दुखद विडंबना बन चुकी है कि हर बड़ी घटना को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगा है। जब भी सत्तापक्ष के किसी प्रभाव वाले क्षेत्र या उनके कार्यकाल में कोई गंभीर अपराध घटित होता है, तो सबसे पहले विपक्षी दलों के हमलों से बचने के लिए लीपापोती और पर्दाफाश का दौर शुरू हो जाता है। जमुई की घटना के संदर्भ में भी यही पुराना सियासी खेल खेला गया। प्रशासन और सत्ता से जुड़े लोगों ने अपनी नाकामी को छुपाने के लिए इसे एक सामान्य और छिटपुट विवाद का रूप देने की पूरी कोशिश की ताकि मीडिया की सुर्खियों से इस मामले को जल्द से जल्द गायब किया जा सके। लेकिन आज के डिजिटल और जागरूक दौर में जनता हर एक बयान और हर एक चेहरे को बहुत बारीकी से पहचान रही है। सोशल मीडिया और मुखर मीडिया की बदौलत अब अपराधियों और उन्हें संरक्षण देने वाले चेहरों को छुपाना आसान नहीं रह गया है, और जनता ऐसे हर नेता को आगामी चुनावों में सबक सिखाने का मन बना चुकी है।

जमुई की घटना और उस पर दिए गए संवेदनहीन बयानों ने यह साबित कर दिया है कि हमारे प्रशासनिक और राजनीतिक तंत्र में अभी भी संवेदनशीलता और जवाबदेही की बहुत बड़ी कमी है। जनता अब केवल खोखले आश्वासनों और लीपापोती वाले बयानों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। जिन सरकारी चेहरों ने एक गंभीर अपराध को छिटपुट बताकर पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है, उन्हें जनता की अदालत में पूरी तरह बेनकाब किया जाना बेहद जरूरी है। जब तक शासन और प्रशासन अपनी इस दंभी और लापरवाह कार्यशैली को नहीं बदलेंगे, तब तक राज्य में कानून का राज स्थापित होने का दावा पूरी तरह खोखला ही रहेगा। जरूरत इस बात की है कि सरकार ऐसे अधिकारियों और नेताओं पर सख्त कार्रवाई करे ताकि भविष्य में कोई भी नुमाइंदा जनता के दुख को छोटा बताने की जुर्रत न कर सके और पीड़ित परिवारों को समय पर वास्तविक न्याय मिल सके।