मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बयान पर दिया ऐसा अजब-गजब ज्ञान
भारतीय राजनीति में बयानों के तीर और नेताओं के अजीबोगरीब अंदाज हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं, लेकिन जब बात बिहार की सियासी पिच की हो, तो मनोरंजन और ड्रामे की कोई कमी नहीं रहती। बिहार की राजनीति में अपने चटपटे बयानों और अनूठे अंदाज के लिए मशहूर एक जाने-माने और विवादित राजनेता, जिन्हें अक्सर लोग अपनी राजनीतिक भविष्यवाणियों के चलते 'मौसम वैज्ञानिक' की संज्ञा देते हैं, ने एक बार फिर से सुर्खियों में अपनी जोरदार एंट्री कर ली है। इस बार उनका निशाना देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार बने हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा चुनाव सुधारों, चुनावी प्रक्रियाओं और निष्पक्षता को लेकर दिए गए हालिया बयानों पर इस 'मौसम वैज्ञानिक' राजनेता ने ऐसा बेतुका और राजनीतिक ज्ञान पेलना शुरू कर दिया है, जिसे सुनकर आम जनता से लेकर बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक भी अपना सिर पकड़ने पर मजबूर हो गए हैं। हमेशा हवा के रुख के साथ अपने बयान बदलने के लिए कुख्यात इस नेता ने चुनाव आयोग की साख और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जो बयानबाजी की है, उसने एक बार फिर से राज्य के राजनीतिक तापमान को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर इस 'मौसम वैज्ञानिक' नेता ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के किस मुद्दे पर क्या कुछ कहा है और इसके पीछे उनकी राजनीतिक चाल क्या है।
बिहार की राजनीति में जब भी कोई बड़ा चुनाव नजदीक आता है, तो ऐसे बयानों का बाजार गर्म होना आम बात हो जाती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देश में निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध चुनाव कराने के लिए हाल ही में जो दिशा-निर्देश और सख्त रुख अपनाया है, उसकी देश भर में तारीफ हो रही है। लेकिन हमारे इन 'मौसम वैज्ञानिक' राजनेता महोदय को शायद चुनाव आयोग की यह सख्ती रास नहीं आ रही है। उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में प्रेस कॉन्फ्रेंस या मीडिया के सामने आकर मुख्य चुनाव आयुक्त के बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना शुरू कर दिया और अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए आयोग की निष्पक्षता पर ही उंगली उठा दी। उनके इस बयान के सामने आते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर से जुबानी जंग छिड़ गई है और लोग यह सोचने पर मजबूर हो गए हैं कि आखिर चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ इस तरह की बयानबाजी करने का क्या औचित्य है।
कौन हैं बिहार के ये 'मौसम वैज्ञानिक' राजनेता और क्या है उनकी फितरत?
बिहार की राजनीति को करीब से जानने वाला हर शख्स यह अच्छी तरह जानता है कि जब भी सियासी हवा का रुख बदलता है, तो सबसे पहले बयान बदलने वाले इन नेताजी का नाम सबसे ऊपर आता है। इन्हें 'मौसम वैज्ञानिक' इसलिए कहा जाता है क्योंकि चुनाव के मौसम में इनकी भविष्यवाणियां और इनके पाला बदलने के अंदाज पर लोग चुटकी लेते रहते हैं। इस बार जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देश की चुनावी व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी और डिजिटल बनाने की बात कही, तो इन नेताजी को अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई नजर आने लगी। उन्हें लगा कि अगर चुनाव आयोग के कड़े नियमों से धांधली और पुराने तौर-तरीकों पर रोक लगेगी, तो उनकी राजनीति को झटका लग सकता है। बस फिर क्या था, उन्होंने तुरंत माइक संभाला और चुनाव आयुक्त के बयानों पर अपना 'विशेषज्ञ ज्ञान' देना शुरू कर दिया, जो पूरी तरह से राजनीतिक प्रेरित और अनर्गल प्रलाप के अलावा कुछ भी नहीं था।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर क्यों गरमाई सियासत?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने देश में चुनावों की शुचिता बनाए रखने के लिए जो कड़े कदम उठाए हैं, उससे उन तमाम नेताओं में खलबली मची हुई है जो चुनावी प्रक्रिया में अपने हिसाब से हेरफेर करने की फिराक में रहते हैं। 'मौसम वैज्ञानिक' नेता द्वारा दिए गए इस बयान के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश की गई है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसे नेता सिर्फ मीडिया में बने रहने के लिए और अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए इस तरह के बयान देते हैं, जिनका जनता की वास्तविक समस्याओं से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता है। जनता अब इन सियासी बयानों की सच्चाई अच्छी तरह समझ चुकी है और चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर ऐसे अनर्गल हमलों का जवाब आने वाले समय में खुद मतदाता अपने मताधिकार के जरिए देते हैं।