तेजस्वी यादव के ‘पावर सेंटर’ बनने के बाद से आरजेडी के लिए एमएलसी चुनाव बने एक कठिन चुनौती
बिहार की सियासत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान सत्ता समीकरणों और राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसने क्षेत्रीय दलों के भीतर की गुटबाजी को सतह पर ला दिया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के भीतर जब से पार्टी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने मुख्य रूप से ‘पावर सेंटर’ के रूप में अपनी कमान संभाली है और संगठन के सभी बड़े फैसले अपने हाथ में लिए हैं, तब से पार्टी के सामने विधान परिषद यानी एमएलसी (MLC) चुनाव एक बेहद कठिन और पेचीदा चुनौती बन गए हैं। किसी भी राजनीतिक दल के भीतर जब युवा नेतृत्व का दौर आता है, तो पुरानी शैली के नेताओं और नई कार्यशैली के बीच एक वैचारिक व रणनीतिक टकराव होना स्वाभाविक माना जाता है, और आरजेडी में भी पिछले चार साल के इस छोटे से अंतराल के दौरान एमएलसी चुनाव के टिकट वितरण व प्रबंधन को लेकर कम से कम तीन बड़े और गंभीर राजनीतिक विवाद खुलकर सामने आ चुके हैं। इन विवादों ने न केवल पार्टी के आंतरिक अनुशासन पर सवालिया निशान खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दिखाया है कि कैसे पार्टी के भीतर सांगठनिक निर्णयों को लेकर पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं तथा नए नेतृत्व के बीच खींचतान लगातार बढ़ती जा रही है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व कौशल के लिए इन चुनौतियों से निपटना और पार्टी को एकजुट रखना आने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित होने वाला है, क्योंकि विधान परिषद जैसे उच्च सदन के चुनाव पार्टी की वैचारिक पकड़ और आर्थिक-राजनीतिक प्रबंधन की मजबूत परीक्षा लेते हैं।
युवा नेतृत्व और पुरानी राजनीतिक शैली के बीच बढ़ता सांगठनिक संघर्ष
राजद जैसी पारंपरिक पार्टी में, जो दशकों से सामाजिक न्याय और एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण के बूते अपनी राजनीति करती आई है, अचानक से कॉरपोरेट स्टाइल या अत्यधिक चुनिंदा फैसलों वाली कार्यशैली को लागू करना आसान काम नहीं होता है। तेजस्वी यादव के मुख्य ‘पावर सेंटर’ बनने के बाद पार्टी के अंदर यह संदेश गया कि अब टिकटों का आवंटन और सांगठनिक पदों पर नियुक्तियां पूरी तरह से निष्पक्षता और जमीनी मेहनत के आधार पर होंगी, लेकिन जमीनी हकीकत में कई बार इसके विपरीत परिणाम देखने को मिले। जब पुराने और दिग्गज नेताओं की अनदेखी करके नए या उन चेहरों को प्राथमिकता दी जाने लगी जो युवा नेतृत्व के करीबी माने जाते हैं, तो पार्टी के भीतर असंतोष का सुलगता हुआ शोला बाहर आने में देर नहीं लगी। एमएलसी चुनाव, जो कि अप्रत्यक्ष रूप से स्थानीय निकायों या विधानसभा के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा लड़े जाते हैं और जिनमें भारी-भरकम संसाधनों की भी आवश्यकता होती है, वहां टिकट वितरण को लेकर हुई गफलत ने आरजेडी के आंतरिक मामलों को मीडिया की सुर्खियों में ला दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का एक धड़ा लगातार यह महसूस करने लगा कि फैसले लेते वक्त उनके अनुभवों और सुझावों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है, जिससे संगठन के भीतर एक मानसिक दूरी बनती चली गई और आपसी विश्वास में कमी आई।
चार साल के भीतर एमएलसी चुनाव से जुड़े तीन बड़े विवादों की अंदरूनी कहानी
पिछले चार वर्षों के राजनीतिक सफर पर अगर गहरी नजर डाली जाए, तो आरजेडी के भीतर एमएलसी चुनावों के दौरान कम से कम तीन ऐसे प्रमुख विवाद खड़े हुए जिन्होंने पार्टी की किरकिरी कराई और शीर्ष नेतृत्व को असहज स्थिति में ला खड़ा किया। पहला विवाद टिकट बंटवारे के दौरान जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को पूरी तरह से दरकिनार करने के आरोपों को लेकर था, जहां पार्टी के कई पुराने कार्यकर्ताओं ने खुलकर आलाकमान के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया था। दूसरा विवाद चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग और पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशियों के खिलाफ भीतरघात से जुड़ा था, जिसमें यह बात सामने आई कि पार्टी के भीतर ही कुछ ताकतें अपने ही उम्मीदवार को हरने के लिए अंदरखाने साजिश रच रही थीं। और तीसरा तथा सबसे ताजा विवाद तब सामने आया जब विधान परिषद चुनाव के टिकटों के चयन को लेकर कुछ ऐसे नाम सामने आए जिन पर विरोधी दलों ने भाई-भतीजावाद और धनबल के इस्तेमाल के गंभीर आरोप मढ़े, जिससे पार्टी की सेक्युलर और सामाजिक न्याय की छवि को धक्का लगा। इन तीनों ही मामलों में तेजस्वी यादव को खुद आगे आकर डैमेज कंट्रोल करना पड़ा और कई नाराज नेताओं को मनाना पड़ा, लेकिन इन विवादों ने यह साबित कर दिया कि पार्टी की कमान संभालने के बाद से चुनावी प्रबंधन में अभी भी कई बड़ी खामियां मौजूद हैं जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है।
आगामी चुनावों से पहले राजद के लिए सांगठनिक एकता और अनुशासन की बड़ी परीक्षा
विधान परिषद के ये चुनाव भले ही सीधे आम जनता के बीच नहीं लड़े जाते हैं, लेकिन इनका प्रभाव पूरे राज्य के राजनीतिक गलियारों और प्रशासनिक तंत्र पर बहुत गहरा पड़ता है, क्योंकि ये सदन राज्य के सबसे बुद्धिजीवी और अनुभवी मंचों में गिने जाते हैं। यदि पार्टी के भीतर टिकट वितरण को लेकर बार-बार विवाद खड़े होंगे और वरिष्ठ नेताओं के साथ समन्वय की कमी बनी रहेगी, तो इसका सीधा असर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा। बिहार की राजनीति में आने वाले बड़े चुनावी दंगल को जीतने के लिए केवल युवा चेहरे और रैलियों की भीड़ काफी नहीं होती, बल्कि इसके लिए एक मजबूत, अनुशासित और एकजुट सांगठनिक मशीनरी की आवश्यकता होती है जो हर मोर्चे पर सटीक रणनीति के साथ काम कर सके। तेजस्वी यादव के सामने इस समय सबसे बड़ी और मुख्य चुनौती यही है कि वे पार्टी के पुराने दिग्गजों और युवा विंग के बीच एक बेहतर सामंजस्य बिठाएं ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों की पुनरावृत्ति न हो सके। यदि वे इन आंतरिक अंतर्विरोधों को समय रहते सुलझाने में सफल हो जाते हैं, तो आरजेडी एक मजबूत और आक्रामक विकल्प के रूप में उभर सकती है, अन्यथा इस प्रकार की अंदरूनी कलह पार्टी के बड़े सपनों को बीच रास्ते में ही तोड़ सकती है।