MLC चुनाव का घमासान: महागठबंधन में अपनों की ही घेराबंदी से बढ़ी मुश्किल
बिहार और देश के अन्य राज्यों की राजनीति में जब भी विधान परिषद यानी एमएलसी (MLC) चुनावों का बिगुल बजता है, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के खेमों में जोड़-तोड़ की राजनीति अपने चरम पर पहुंच जाती है। इस बार के एमएलसी चुनावों के माहौल ने राजनीतिक गलियारों का पारा पूरी तरह से हाई कर दिया है, क्योंकि यहाँ जितने कड़े मुकाबले बाहर विरोधियों के बीच हैं, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक खेल पार्टियों के भीतर खेला जा रहा है। एक तरफ जहां विपक्षी महागठबंधन (Mahagathbandhan) में शामिल तीन प्रमुख साथी दल एक-दूसरे को पटखनी देने के लिए अंदरखाने सियासी बिसात बिछा रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ मजबूत स्थिति में नजर आ रही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर भी अपनों के द्वारा ही भीतरघात (Cross Voting) किए जाने का तगड़ा खतरा मंडरा रहा है। इस अनोखे और रोचक राजनीतिक ड्रामे ने चुनाव परिणामों को बेहद रोमांचक बना दिया है। आइए जानते हैं कि इस एमएलसी चुनाव के रण में चल रही उठापटक के पीछे की पूरी असली कहानी क्या है और कौन किस पर भारी पड़ने की फिराक में है।
Mahagathbandhan Internal Rift: महागठबंधन के तीन मुख्य दलों के बीच टिकट और वर्चस्व की जंग, कौन काट रहा है किसका पत्ता
महागठबंधन में शामिल दलों के बीच तालमेल और एकजुटता के दावे भले ही सार्वजनिक मंचों से बड़े-बड़े भाषणों के जरिए किए जाते हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। एमएलसी चुनाव की सरगर्मी शुरू होते ही गठबंधन के तीनों मुख्य साथियों के बीच इस बात को लेकर रस्साकशी शुरू हो गई है कि किस सीट पर किसका उम्मीदवार उतरेगा और कौन किसे समर्थन देगा। स्थिति यह बन चुकी है कि नाममात्र का गठबंधन होने के बावजूद अंदरखाने हर दल अपने राजनीतिक वजूद को बचाने और अपने पाले को मजबूत करने के लिए दूसरे साथी की जीत की संभावनाओं को कमजोर करने की चालें चल रहा है। स्थानीय नेताओं के बीच टिकट बंटवारे को लेकर उपजा असंतोष और आपसी अविश्वास इस कदर बढ़ गया है कि विरोधी दलों को हराने से ज्यादा जोर इस बात पर दिया जा रहा है कि कहीं साथी दल का उम्मीदवार ज्यादा मजबूत न हो जाए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आपसी अंतर्कलह और खींचतान का सीधा फायदा चुनाव मैदान में अन्य उम्मीदवारों को मिल सकता है, जिससे महागठबंधन की चुनावी रणनीति पर बड़ा सवालिया निशान लग रहा है।
BJP Inner Conflict and Cross Voting Fear: सत्ताधारी बीजेपी खेमे में भी अपनों की बगावत का डर, भीतरघात बिगाड़ सकता है पूरा खेल
दूसरी ओर, यदि बात भारतीय जनता पार्टी और उसके एनडीए गठबंधन की की जाए, तो कागज पर भले ही उनका संगठन सबसे मजबूत और अनुशासित नजर आ रहा हो, लेकिन अंदरखाने की तस्वीरें उतनी साफ नहीं हैं। एमएलसी चुनाव की प्रकृति ऐसी होती है जिसमें मतदाताओं का दायरा आम जनता न होकर स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधि यानी पंचायत प्रतिनिधि, वार्ड सदस्य, मुखिया और जिला परिषद सदस्य होते हैं। इस विशेष प्रकार के इलेक्टोरल कॉलेज में व्यक्तिगत और स्थानीय समीकरण जातिगत और दलीय सीमाओं से बहुत ऊपर उठकर काम करते हैं। यही वजह है कि बीजेपी के भीतर भी कई ऐसे बागी और असंतुष्ट चेहरे सक्रिय हो चुके हैं जो पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ खुलकर या दबे जुबान से भीतरघात करने की रणनीति बना रहे हैं। टिकट वितरण से वंचित रहे नेताओं का गुस्सा और स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई पार्टी के रणनीतिकारों की नींद उड़ाए हुए है, क्योंकि एमएलसी चुनाव में एक-एक वोट का हिसाब बहुत कीमती होता है और जरा सी चूक पूरी बाजी को पलट सकती है।
Local Body Representatives Role: पंचायत प्रतिनिधियों के पाला बदलने से हर पल बदल रहे चुनावी समीकरण, प्रत्याशियों की धड़कनें तेज
इस बार के विधान परिषद चुनावों में सबसे बड़ा निर्णायक कारक वे स्थानीय निकाय के जनप्रतिनिधि साबित हो रहे हैं जो वोट डालने वाले हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से चुनकर आए इन छोटे जनप्रतिनिधियों की अपनी कुछ स्थानीय मांगें, समस्याएं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं होती हैं। दोनों ही बड़े सियासी खेमे यानी महागठबंधन और बीजेपी के उम्मीदवार इन मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसी हर नीति का खुलकर इस्तेमाल कर रहे हैं। रात के अंधेरे में होने वाली गुप्त बैठकों और मेल-मिलाप का दौर जोरों पर है, जिससे यह अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल हो गया है कि कौन सा जनप्रतिनिधि ऐन वक्त पर किस पार्टी के पक्ष में बटन दबाएगा। यही अनिश्चितता उम्मीदवारों की रातों की नींद उड़ाई हुई है और हर कोई अपनी जीत को पक्का करने के लिए अंतिम समय तक कोई भी जोखिम उठाने से बचना चाहता है।
Political Future and Impact: इस कांटे के मुकाबले का आने वाले बड़े राजनीतिक भविष्य पर क्या पड़ेगा गहरा असर
बिहार या अन्य राज्यों के इन हाई-प्रोफाइल एमएलसी चुनावों के नतीजे केवल विधान परिषद की कुछ सीटों के आने-जाने तक सीमित नहीं होते, बल्कि ये आने वाले बड़े विधानसभा या आम चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की ताकत और उनके सांगठनिक नियंत्रण का लिटमस टेस्ट माने जाते हैं। यदि महागठबंधन के दल आपसी कलह की वजह से चुनाव हार जाते हैं, तो इसका ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ा जाएगा और यदि बीजेपी अपने घर के भीतर हो रहे भीतरघात को रोकने में नाकाम रहती है, तो पार्टी नेतृत्व के अनुशासन के दावों पर आंच आ सकती है। बहरहाल, राजनीतिक अखाड़े में बिछ चुकी इन तमाम चालों और प्रत्याशियों की धड़कनों के बीच जनता और विश्लेषकों की निगाहें पूरी तरह से इस बात पर टिकी हैं कि जब मतपेटियां खुलेंगी, तो अपनों की चाल कामयाब होती है या फिर संगठन की रणनीति बाजी मार ले जाती है।