बिहार चुनाव नतीजे निर्दलियों का गेम ओवर, जनता ने बता दिया अब सिर्फ सरकार चाहिए सौदा नहीं

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News India Live, Digital Desk: इस बार के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक बात तो शीशे की तरह साफ कर दी है बिहार अब बदल रहा है।हम सबने वो दौर देखा है जब विधानसभा में 4-5 निर्दलीय विधायक (Independent MLAs) जीतकर आते थे और सरकार बनाने के लिए अपनी शर्तें मनवाते थे। वे खुद को "किंगमेकर" समझते थे। सरकार चाहे इधर की बने या उधर की, चाबी अक्सर इन छोटे दलों या निर्दलियों की जेब में होती थी।

लेकिन दोस्तों, इस बार के नतीजों ने उस चाबी को ही समुद्र में फेंक दिया है।

'दो टूक' फैसला, कन्फ्यूजन खत्म
चुनाव के नतीजे बताते हैं कि बिहार की जनता अब समझदार हो गई है। उसने तय कर लिया था कि वोट उसे ही देंगे जो सरकार बना सके। उसने अपना वोट छोटे-मोटे निर्दलियों या तीसरे मोर्चे (Third Front) पर 'बर्बाद' करना मुनासिब नहीं समझा।

परिणाम? बिहार विधानसभा में "अन्य" (Others) या निर्दलियों की जगह सिकुड़ कर ना के बराबर रह गई है। जनता ने सीधा मुकाबला दो बड़े गठबंधनों के बीच माना और किसी एक को चुना।

'तीसरे मोर्चे' की हवा निकली
हर चुनाव से पहले बिहार में एक शोर उठता था कि "इस बार हम तीसरा विकल्प बनेंगे।" कभी कोई नया मोर्चा बनता, तो कभी निर्दलियों का ग्रुप। लेकिन वोटरों ने इसे सिरे से नकार दिया। अब बिहार की राजनीति 'बाइनरी' (Binary) हो गई है—या तो आप इधर हैं या उधर। बीच का कोई रास्ता नहीं है।

ब्लैकमेलिंग और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स पर ताला
इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि सरकार बनने के बाद जो 'मोलभाव' होता था, वह बंद हो जाएगा। याद है न? कैसे एक-दो विधायक टूटने के डर से पूरी सरकार हिल जाती थी? विधायकों को रिसॉर्ट में बंद करना पड़ता था।
जब निर्दलियों की संख्या न के बराबर होगी, तो सरकार भी स्थिरता (Stability) के साथ काम कर पाएगी। यह लोकतंत्र के लिए एक अच्छा संकेत है।

नेताओं के लिए सबक
जो बाहुबली या धनबल के दम पर पार्टी से टिकट न मिलने पर निर्दलीय खड़े हो जाते थे, उनके लिए यह नतीजे एक जोरदार तमाचा हैं। जनता ने कह दिया है पार्टी सिंबल और विचारधारा मायने रखती है, आपका निजी रसूख नहीं।

कुल मिलाकर, बिहार ने 'खिचड़ी' सरकार के बजाय एक 'मजबूत' सरकार (चाहे जिसकी भी हो) को चुना है। निर्दलियों का रसूख खत्म होना यह बताता है कि बिहार का वोटर अब स्थिरता चाहता है, नाटक नहीं।

अब देखना यह है कि जो स्पष्ट बहुमत या जनादेश मिला है, उसका नेता जी कितना सम्मान करते हैं।