इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी के नियमों में बड़ा बदलाव ,अब बिना रेगुलर क्लास नहीं मिलेगी पार्ट-टाइम डिग्री
News India Live, Digital Desk: इलाहाबाद विश्वविद्यालय (AU) से पीएचडी (PhD) करने का सपना देख रहे अभ्यर्थियों, विशेषकर नौकरीपेशा लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण खबर है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पीएचडी के नियमों में कड़ाई करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि अब पार्ट-टाइम पीएचडी करने वालों को भी नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित होना होगा। शोध की गुणवत्ता को सुधारने और अकादमिक अनुशासन बनाए रखने के लिए यह कड़ा फैसला लिया गया है, जिससे उन लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जो केवल नाम मात्र के लिए शोध कार्य से जुड़ना चाहते थे।
कोर्सवर्क और अटेंडेंस अब अनिवार्य
नए नियमों के मुताबिक, पार्ट-टाइम पीएचडी में दाखिला लेने वाले शोधार्थियों को कम से कम छह महीने तक नियमित रूप से कैंपस आना होगा। इस दौरान उन्हें निर्धारित 'कोर्सवर्क' पूरा करना होगा और शोध से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। पहले कई मामलों में देखा गया था कि नौकरीपेशा लोग बिना कॉलेज आए शोध कार्य पूरा कर लेते थे, लेकिन अब बायोमेट्रिक या रजिस्टर अटेंडेंस के बिना थिसिस जमा करना मुमकिन नहीं होगा।
नौकरीपेशा शोधार्थियों के लिए बढ़ी चुनौती
यह बदलाव उन अभ्यर्थियों के लिए एक बड़ी चुनौती है जो सरकारी या निजी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। नियमों के तहत, ऐसे शोधार्थियों को अपने कार्यस्थल से कम से कम छह महीने की छुट्टी या 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि वे विश्वविद्यालय की नियमित कक्षाओं में शामिल हो सकें। विश्वविद्यालय का मानना है कि शोध केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके लिए गाइड (Supervisor) के साथ सीधा संवाद और लैब/लाइब्रेरी का नियमित उपयोग अनिवार्य है।
यूजीसी के मानकों के अनुरूप कड़ाई
इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने यह कदम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नवीनतम दिशा-निर्देशों को ध्यान में रखते हुए उठाया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि पार्ट-टाइम और फुल-टाइम पीएचडी के बीच शैक्षणिक गुणवत्ता का अंतर समाप्त होना चाहिए। नए सत्र 2025-26 से इन नियमों को सख्ती से लागू किया जा रहा है। शोधार्थियों को अब अपने रिसर्च प्रपोजल के साथ-साथ अपनी उपस्थिति का पूरा ब्यौरा भी संबंधित विभाग में जमा करना होगा।