शाहबाज सरकार को तगड़ा झटका तुर्की ने इस्लामिक NATO से पल्ला झाड़ा,पाकिस्तान-सऊदी के डिफेंस पैक्ट में शामिल होने से किया इनकार
News India Live, Digital Desk: पाकिस्तान की उस महात्वाकांक्षी योजना को गहरा धक्का लगा है, जिसे राजनीतिक हलकों में 'इस्लामिक नाटो' कहा जा रहा था। तुर्की (Türkiye) ने आधिकारिक तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि वह पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते (Trilateral Defense Pact) का हिस्सा नहीं बनेगा। तुर्की के इस फैसले ने न केवल पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को भी बदल कर रख दिया है।
तुर्की ने क्यों पीछे खींचे कदम? 'बदहाल फौज' और 'कमजोर अर्थव्यवस्था' बनी वजह
सूत्रों के अनुसार, तुर्की ने इस गठबंधन से दूरी बनाने के पीछे पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को मुख्य कारण बताया है।
पाकिस्तान सेना पर दबाव: तुर्की के रक्षा अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना पहले से ही तीन मोर्चों (आतंकवाद, सीमा विवाद और आंतरिक अस्थिरता) पर भारी दबाव में है। ऐसे में पाकिस्तान किसी भी साझा रक्षा जिम्मेदारी को उठाने की स्थिति में नहीं है।
आर्थिक विषमता: तुर्की का कहना है कि एक मजबूत सेना के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था अनिवार्य है। सऊदी अरब के पास निवेश करने की क्षमता है, जबकि पाकिस्तान और तुर्की की मौजूदा आर्थिक स्थिति इस तरह के बड़े रक्षा आधुनिकीकरण के लिए फिलहाल अनुकूल नहीं है।
'इस्लामिक नाटो' का सपना टूटा: क्या था शाहबाज शरीफ का प्लान?
पाकिस्तान लंबे समय से तुर्की को उस सुरक्षा ढांचे में शामिल करने की कोशिश कर रहा था, जिसे पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच साइन किया गया था।
म्युचुअल डिफेंस क्लॉज: इस समझौते का मसौदा नाटो के 'आर्टिकल 5' जैसा था, जिसमें एक देश पर हमले को तीनों पर हमला माना जाना था।
रणनीतिक बढ़त: शाहबाज शरीफ चाहते थे कि इस गठबंधन के जरिए पाकिस्तान को तुर्की की आधुनिक ड्रोन तकनीक और सऊदी अरब का वित्तीय बैकअप मिले।
सऊदी अरब का रुख: "यह केवल द्विपक्षीय रहेगा"
सऊदी सैन्य सूत्रों ने भी स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान के साथ उनका रक्षा समझौता 'द्विपक्षीय' (Bilateral) ही रहेगा।
त्रिपक्षीय वार्ता का खंडन: सऊदी अरब ने उन मीडिया रिपोर्ट्स को खारिज कर दिया है जिनमें दावा किया गया था कि तीनों देश मिलकर एक साझा सैन्य गुट बना रहे हैं।
अंकारा की प्राथमिकता: तुर्की खुद को किसी नए सैन्य गुट में बांधने के बजाय क्षेत्रीय सहयोग और द्विपक्षीय व्यापार पर ध्यान देना चाहता है।
भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
भारत इस घटनाक्रम पर करीब से नजर बनाए हुए था। विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की का इस गुट से बाहर रहना भारत के लिए राहत की खबर है। यदि यह 'त्रिपक्षीय ब्लॉक' बन जाता, तो यह कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान को अधिक मुखर होने और सैन्य शक्ति प्रदर्शन करने में मदद कर सकता था। तुर्की के इनकार ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर दिया है।