BREAKING:
April 25 2026 05:28 am

झारखंड में खनन माफियाओं पर बड़ी चोट, जंगलों के 500 मीटर के दायरे में माइनिंग पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

Post

News India Live, Digital Desk: झारखंड में पर्यावरण संरक्षण और वनों की सुरक्षा को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि राज्य के किसी भी वन क्षेत्र (Forest Area) की सीमा से 500 मीटर के दायरे में किसी भी प्रकार का खनन कार्य (Mining) नहीं किया जाएगा। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख से अवैध खनन करने वालों और नियमों को ताक पर रखकर लीज हासिल करने वाले सिंडिकेट में हड़कंप मच गया है।

इको-सेंसिटिव जोन की सुरक्षा के लिए कड़ा कदम

अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जंगलों के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए 'बफर जोन' का होना अनिवार्य है। अक्सर देखा जाता है कि जंगल की सीमा से सटकर हो रही माइनिंग के कारण न केवल वन्यजीवों का आवास प्रभावित होता है, बल्कि पर्यावरण को भी अपूरणीय क्षति पहुंचती है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और खनन विभाग को निर्देश दिया है कि वे इस 500 मीटर की सीमा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराएं।

पुरानी लीज पर भी लटकी तलवार

इस आदेश का सबसे बड़ा असर उन माइनिंग लीज पर पड़ेगा जो वर्तमान में जंगलों के बेहद करीब संचालित हो रही हैं। कोर्ट ने साफ किया कि नियमों का उल्लंघन कर दी गई कोई भी मंजूरी अवैध मानी जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद राज्य के कई जिलों, विशेषकर चतरा, पलामू, लातेहार और गिरिडीह जैसे वन बहुल इलाकों में चल रहे क्रशर और पत्थर खदानों पर ताला लग सकता है।

प्रदूषण और वन्यजीवों के पलायन पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि भारी मशीनों और विस्फोटों (Blasting) के कारण जंगलों की शांति भंग हो रही है, जिससे हाथी और अन्य जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। 500 मीटर की यह 'नो माइनिंग लिमिट' प्रदूषण को नियंत्रित करने और जंगलों के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने में एक ढाल का काम करेगी।

सरकार को मैपिंग और रिपोर्ट पेश करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह राज्यभर के वन क्षेत्रों की डिजिटल मैपिंग कराए और यह सुनिश्चित करे कि कोई भी नया पट्टा (Lease) इस निर्धारित सीमा के भीतर न दिया जाए। साथ ही, अब तक दिए गए पट्टों की समीक्षा कर एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करने को कहा गया है। पर्यावरणविदों ने इस फैसले को झारखंड के 'जल-जंगल-जमीन' की रक्षा के लिए एक मील का पत्थर बताया है।