लखनऊ का 'बिग बेन', जो असल बिग बेन से भी था बड़ा!
अगर आप कभी लखनऊ के हुसैनाबाद इलाके में जाएं, तो छोटे इमामबाड़े के पास आसमान को छूती एक शानदार इमारत आपकी नज़रें रोक लेगी. यह है लखनऊ का घंटाघर. पहली नज़र में यह आपको लंदन के मशहूर बिग बेन की याद दिलाएगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह सिर्फ नकल नहीं है, बल्कि कुछ मामलों में यह असल बिग बेन से भी ज़्यादा बड़ा और बेहतर था!
221 फुट ऊंचा यह घंटाघर कभी भारत का सबसे ऊंचा क्लॉक टावर हुआ करता था. आज यह सिर्फ समय बताने वाली मशीन नहीं, बल्कि लखनऊ की शान और नवाबी दौर के उस सुनहरे वक्त की कहानी है, जब यहाँ कला और इंजीनियरिंग अपने शिखर पर थी.
कैसे बना यह शानदार घंटाघर?
इसकी कहानी अवध के तीसरे नवाब, मुहम्मद अली शाह से जुड़ी है. उन्होंने हुसैनाबाद इमामबाड़े की देखरेख के लिए एक ट्रस्ट बनाया था और उसमें छत्तीस लाख रुपये की भारी-भरकम रकम जमा की थी. उसी ट्रस्ट ने 1887 में इस घंटाघर को बनवाने का फैसला किया और उस ज़माने में इसके निर्माण पर दो लाख रुपये का खर्च आया.
इसे बनाने का ज़िम्मा मिला एक मशहूर ब्रिटिश आर्किटेक्ट, रिचर्ड रोस्केल बेने को. उन्होंने ब्रिटिश और मूरिश वास्तुकला को मिलाकर एक ऐसा डिज़ाइन तैयार किया जो आज भी देखने वालों का दिल जीत लेता हैं
क्यों था यह बिग बेन से भी बेहतर?
भले ही इसकी डिज़ाइन लंदन के बिग बेन से प्रेरित थी, लेकिन इंजीनियरों ने इसे और भी बेहतर बनाया.
घंटियों की मधुर धुन
इसकी खूबसूरती सिर्फ़ इसकी ऊँचाई में ही नहीं, बल्कि इसकी आवाज़ में भी है। इसमें पाँच घंटियाँ लगी हैं, जिन्हें बजाने पर पूरे इलाके में एक मधुर और सुरीली धुन गूंजती है। रात में जब यह जगमगाती है, तो इसकी खूबसूरती देखने लायक होती है।
आज यह घंटाघर सिर्फ़ एक घड़ी नहीं, बल्कि उस ज़माने की इंजीनियरिंग और कला का जीता-जागता सबूत है। यह एक ऐसी विरासत है, जो हमें याद दिलाती है कि एक ज़माना था जब लखनऊ शहर समय से दो कदम आगे था।