डॉ. आंबेडकर का बड़ा विश्लेषण भारत से क्यों खत्म हुआ बौद्ध धर्म? इस्लामी आक्रमण और प्राचीन इतिहास पर बाबा साहेब के विचार
News India Live, Digital Desk: भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि एक प्रखर इतिहासकार और शोधकर्ता भी थे। उन्होंने भारतीय धर्मों और समाज के पतन के कारणों पर गहराई से अध्ययन किया था। अक्सर यह सवाल उठता है कि जिस बौद्ध धर्म की जड़ें भारत में इतनी गहरी थीं, वह यहाँ से लगभग विलुप्त क्यों हो गया? बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक और लेखों में इसके लिए 'इस्लामी आक्रमणों' को एक प्रमुख कारण बताया है। उनके तर्कों ने इस ऐतिहासिक बहस को एक नई दिशा दी है।
नालंदा और विक्रमशिला का विनाश: शिक्षा के केंद्रों पर प्रहार
डॉ. आंबेडकर के अनुसार, भारत में बौद्ध धर्म के पतन की शुरुआत केवल वैचारिक नहीं, बल्कि भौतिक विनाश से हुई थी। 12वीं शताब्दी के अंत में बख्तियार खिलजी जैसे हमलावरों ने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी जैसे महान बौद्ध विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया। बाबा साहेब ने विस्तार से बताया है कि कैसे इन आक्रमणकारियों ने हजारों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या कर दी और अनमोल पांडुलिपियों वाले पुस्तकालयों को जलाकर राख कर दिया। उनका मानना था कि बौद्ध धर्म 'भिक्षु संघ' पर टिका था, और जब संघ के केंद्र ही नष्ट कर दिए गए, तो धर्म को भारी क्षति पहुँची।
ब्राह्मणवाद और इस्लाम के बीच पिस गया बौद्ध धर्म?
बाबा साहेब ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है। उनका तर्क था कि बौद्ध धर्म को दोतरफा चुनौती का सामना करना पड़ा। एक ओर ब्राह्मणवाद के साथ उनका वैचारिक संघर्ष चल रहा था, वहीं दूसरी ओर बाहरी इस्लामी आक्रमणों ने उनकी संगठनात्मक शक्ति को तोड़ दिया। डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि इस्लाम की मूर्तिभंजक नीति ने बौद्ध स्तूपों और मूर्तियों को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया, क्योंकि बौद्ध धर्म पूरी तरह से अपनी शांतिपूर्ण शिक्षाओं और विहारों पर निर्भर था।
क्यों बौद्ध भिक्षु नहीं कर सके मुकाबला?
डॉ. आंबेडकर का विश्लेषण कहता है कि हिंदू धर्म के विपरीत, जिसमें वर्ण व्यवस्था के कारण 'क्षत्रिय' वर्ग रक्षा के लिए मौजूद था, बौद्ध समाज पूरी तरह से अहिंसा और भिक्षु परंपरा पर आधारित था। जब इस्लामी सेनाओं ने हमला किया, तो निहत्थे भिक्षुओं के पास आत्मरक्षा का कोई साधन नहीं था। बड़ी संख्या में भिक्षु मारे गए और जो बचे, वे तिब्बत, नेपाल और चीन की ओर पलायन कर गए। नेतृत्व और मार्गदर्शन की कमी के कारण आम जनता धीरे-धीरे अन्य धर्मों में विलीन हो गई।
बाबा साहेब का निष्कर्ष: एक महान विरासत का अंत
आंबेडकर जी का मानना था कि बौद्ध धर्म का पतन भारत के इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि इस्लामी तलवार ने बौद्ध धर्म की जड़ों पर प्रहार किया, जिसे पहले से ही आंतरिक संघर्षों ने कमजोर कर दिया था। उनके लिए बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान केवल एक धार्मिक बदलाव नहीं, बल्कि भारत की खोई हुई पहचान और समतावादी समाज को वापस पाने का एक तरीका था, इसीलिए उन्होंने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी।