Bhajanlal Sharma Government : अब हम दो, हमारे दो की शर्त नहीं ,तीन बच्चों वाले भी लड़ सकेंगे सरपंच-पार्षद का चुनाव

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News India Live, Digital Desk : राजस्थान की राजनीति में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है, जिसका असर गाँव की चौपाल से लेकर शहर के नगर निगम तक महसूस किया जाएगा। भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली राजस्थान सरकार उस 30 साल पुराने नियम को खत्म करने की तैयारी में है, जिसके तहत दो से ज़्यादा बच्चों वाले लोग पंचायत या नगर निकाय के चुनाव नहीं लड़ सकते थे।

सरकार जल्द ही एक अध्यादेश लाकर राजस्थान पंचायती राज अधिनियम और राजस्थान नगर पालिका अधिनियम में संशोधन करने जा रही है। इसके बाद, वो सभी लोग जिनके दो से ज़्यादा बच्चे हैं, वे भी सरपंच, प्रधान, पार्षद या मेयर जैसे पदों के लिए चुनाव लड़ने के योग्य हो जाएंगे।

क्या था यह 30 साल पुराना नियम?

यह नियम साल 1995 में तत्कालीन भैरों सिंह शेखावत सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसके अनुसार, 27 नवंबर 1995 के बाद जिस भी व्यक्ति के तीसरा बच्चा हुआ हो, वह पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता था। इस नियम के कारण अब तक हजारों संभावित उम्मीदवार चुनाव लड़ने से वंचित रह जाते थे।

क्यों बदला जा रहा है यह फैसला?

लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता और सामाजिक संगठन इस नियम को हटाने की मांग कर रहे थे। उनका तर्क था कि यह नियम लोकतंत्र में सबकी भागीदारी के अवसर को सीमित करता है।

  • भेदभाव का आरोप: इस नियम को भेदभावपूर्ण माना जा रहा था, क्योंकि यह नियम सिर्फ पंचायत और निकाय चुनावों पर लागू होता है, जबकि विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है।
  • नेताओं की बढ़ेगी भागीदारी: इस नियम के हटने से भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के कई बड़े नेता, जो इस शर्त के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे, वे भी अब चुनावी मैदान में उतर सकेंगे।
  • पुरानी मांग: निर्दलीय विधायक चंद्रभान सिंह आक्या ने इसी साल बजट सत्र के दौरान विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था, जिसके जवाब में संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने इसे गंभीर मामला मानते हुए कार्रवाई का आश्वासन दिया था।

कैसे लागू होगा यह बदलाव?

पंचायती राज और स्थानीय स्वशासन विभागों ने इस नियम को हटाने का प्रस्ताव तैयार कर विधि विभाग को भेज दिया है। विधि विभाग से मंज़ूरी मिलने के बाद इस प्रस्ताव को कैबिनेट में रखा जाएगा। कैबिनेट की मंज़ूरी के बाद अध्यादेश जारी किया जाएगा, जिससे यह नियम तुरंत प्रभाव से खत्म हो जाएगा। बाद में, विधानसभा के बजट सत्र में इसे बिल के रूप में पेश कर स्थायी कानून बना दिया जाएगा।

इस फैसले का जहाँ कई संगठन "लोकतंत्र की जीत" बताकर स्वागत कर रहे हैं, वहीं जनसंख्या नियंत्रण के समर्थक इसे एक गलत कदम मान रहे हैं। उनका तर्क है कि यह नियम जनसंख्या नियंत्रण के लिए ज़रूरी था। खैर, इतना तो तय है कि सरकार के इस फैसले से राजस्थान की स्थानीय राजनीति का समीकरण ज़रूर बदलेगा।