हिंदू होने की सज़ा या फिर कुछ और? अमृत मंडल की मौत पर बांग्लादेश सरकार के दावे ने खड़ा किया नया विवाद

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News India Live, Digital Desk : पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और न्यूज़ गलियारों में बांग्लादेश में रहने वाले अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर काफी चर्चा है। इसी बीच 'अमृत मंडल' नाम के व्यक्ति की मौत की खबर ने आग में घी डालने का काम किया है। जहाँ एक तरफ इस घटना को धार्मिक चश्मे से देखा जा रहा है, वहीं अब बांग्लादेश की अंतरिम यूनुस सरकार ने इस मामले पर एक ऐसा बयान दिया है, जिसने बहस को और गरमा दिया है।

सरकार का क्या है दावा?
यूनुस सरकार का साफ़ तौर पर कहना है कि अमृत मंडल की मौत का कारण उनका हिंदू होना नहीं था। सरकार ने आधिकारिक तौर पर उन्हें एक 'गैंगस्टर' यानी अपराधी करार दिया है। उनके मुताबिक, यह मामला किसी सांप्रदायिक हिंसा का नहीं, बल्कि अपराध जगत और कानूनी कार्रवाई से जुड़ा है। सरकार की कोशिश है कि इस घटना को मजहबी रंग न दिया जाए, लेकिन हकीकत की परतें कुछ और ही कह रही हैं।

धरातल पर बढ़ता तनाव
तर्क चाहे जो भी दिए जाएं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के मन में डर की लहर है। जब भी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, जो अल्पसंख्यक समुदाय से हो, तो लोगों का डरा हुआ महसूस करना स्वाभाविक है। स्थानीय लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन अपनी कमियों को छिपाने के लिए 'क्रिमिनल' लेबल का सहारा ले रहा है, जबकि मामला काफी संवेदनशील हो सकता है।

क्यों उलझी हुई है यह गुत्थी?
किसी को 'गैंगस्टर' कह देना आसान है, लेकिन उस दावे के पीछे के सबूतों पर ही दुनिया की नज़र टिकी है। अमृत मंडल के परिवार और वहां के हिंदू समाज का आरोप कुछ और ही है। उनके अनुसार, यह लक्षित हिंसा का मामला है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या वाकई बांग्लादेश में कानून व्यवस्था निष्पक्ष है या फिर खास विचारधारा के दबाव में फैसले लिए जा रहे हैं?

इंतजार है निष्पक्ष जांच का
भारत सरकार ने भी कई बार बांग्लादेश से वहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है। अमृत मंडल के केस में सच्चाई क्या है, यह तो एक गहरी और निष्पक्ष जांच के बाद ही साफ होगा। लेकिन तब तक, दोनों तरफ के दावे हवाओं में तैर रहे हैं और लोगों के बीच बेचैनी बढ़ती जा रही है।

अमृत मंडल सिर्फ एक नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला इस समय बांग्लादेश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने की कड़ी परीक्षा बन चुका है।