Assistant Professor : अब सिर्फ PhD की डिग्री काफी नहीं UGC के नए नियमों से प्रोफेसरों के प्रमोशन का बदला खेल, 'काम' ही बनेगा आधार
News India Live, Digital Desk : विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसरों के लिए प्रमोशन के नियमों में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने बड़ा बदलाव कर दिया है। अब प्रमोशन की सीढ़ी चढ़ने के लिए केवल पीएचडी (PhD) की डिग्री होना पर्याप्त नहीं होगा। नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अब प्रोफेसरों का प्रमोशन उनके 'वर्क परफॉर्मेंस' (Work Basis) और शैक्षणिक योगदान के आधार पर किया जाएगा।
UGC के नए नियम: डिग्री से ज्यादा प्रदर्शन पर जोर
यूजीसी ने स्पष्ट किया है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रमोशन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और परिणामोन्मुखी (Result-oriented) बनाया जा रहा है।
परफॉर्मेंस इंडेक्स: अब शिक्षकों के प्रमोशन के लिए उनके द्वारा किए गए शोध (Research), क्लासरूम टीचिंग की गुणवत्ता, और छात्रों के फीडबैक को आधार बनाया जाएगा।
PhD की भूमिका: हालांकि पीएचडी एक अनिवार्य योग्यता बनी रहेगी, लेकिन अब यह केवल 'प्रवेश द्वार' की तरह होगी। प्रमोशन के लिए शिक्षक को निरंतर शैक्षणिक गतिविधियों में सक्रिय रहना होगा।
क्या हैं प्रमोशन के नए मानक?
नए नियमों के अनुपालन के तहत, असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर और फिर प्रोफेसर बनने के लिए निम्नलिखित मानकों को देखा जाएगा:
रिसर्च पब्लिकेशन: प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित शोध पत्रों की संख्या और उनकी गुणवत्ता।
इनोवेटिव टीचिंग: पढ़ाने के नए और आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल।
प्रशासनिक योगदान: विश्वविद्यालय या कॉलेज के प्रशासनिक कार्यों में भागीदारी।
अनुभव और वर्कलोड: निर्धारित वर्षों का अनुभव और शैक्षणिक सत्र के दौरान लिया गया वर्कलोड।
यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को सख्त निर्देश
यूजीसी ने सभी केंद्रीय, राज्य और निजी विश्वविद्यालयों को इन नए नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया है।
दिशानिर्देशों का अनुपालन: विश्वविद्यालयों को अब अपनी स्क्रीनिंग कमेटियों को पुनर्गठित करना होगा ताकि प्रमोशन केवल योग्य और सक्रिय शिक्षकों को ही मिल सके।
पारदर्शिता: प्रमोशन की पूरी प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग और डॉक्यूमेंटेशन अनिवार्य होगा ताकि किसी भी प्रकार की पक्षपात की गुंजाइश न रहे।
प्रोफेसरों पर क्या होगा असर?
इस बदलाव से उन शिक्षकों को लाभ मिलेगा जो केवल डिग्री लेकर शांत बैठ गए थे, लेकिन अब उन्हें अपनी योग्यता साबित करने के लिए निरंतर काम करना होगा। शिक्षाविदों का मानना है कि इससे उच्च शिक्षा में रिसर्च कल्चर को बढ़ावा मिलेगा और छात्रों को बेहतर गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल सकेगी।