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March 26 2026 05:07 am

झारखंड में नक्सलवाद को एक और बड़ा झटका ,TPC के दो खूंखार कमांडरों ने पुलिस के सामने डाले हथियार

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News India Live, Digital Desk: झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक और बड़ी सफलता मिली है. प्रतिबंधित नक्सली संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी) के दो बड़े कमांडरों ने लातेार पुलिस और सीआरपीएफ के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है. सरेंडर करने वालों में 10 लाख का इनामी जोनल कमांडर नरेश गंझू उर्फ दीपक सिंह और 5 लाख का इनामी सब-जोनल कमांडर श्याम किशोर गंझू शामिल हैं.

इन दोनों का आत्मसमर्पण पुलिस के लिए एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है क्योंकि ये दोनों कई हिंसक घटनाओं को अंजाम दे चुके थे और इलाके में दहशत का पर्याय बने हुए थे.

कौन हैं ये दोनों नक्सली और क्यों महत्वपूर्ण है इनका सरेंडर?

नरेश गंझू उर्फ दीपक सिंह: नरेश गंझू टीपीसी का जोनल कमांडर था और उस पर सरकार ने 10 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था. वह लातेहार के चंदवा थाना क्षेत्र के लुकैया मोड़ पर चार पुलिसकर्मियों की हत्या के मामले में मुख्य आरोपी था. इस घटना ने पूरे राज्य को हिलाकर रख दिया था. नरेश 18 साल की उम्र से ही नक्सली गतिविधियों में शामिल था और उसके खिलाफ 16 से ज्यादा गंभीर मामले दर्ज हैं.

श्याम किशोर गंझू: श्याम किशोर टीपीसी का सब-जोनल कमांडर था और उस पर 5 लाख रुपये का इनाम था. वह भी कई नक्सली वारदातों में शामिल रहा है और संगठन के लिए लेवी (जबरन वसूली) वसूलने का काम करता था.

इन दोनों के मुख्य धारा में लौटने को नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में एक अहम कदम माना जा रहा है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति 'नई दिशा-एक नई पहल' से प्रभावित होकर और पुलिस के लगातार बढ़ते दबाव के कारण इन दोनों ने हथियार डालने का फैसला किया.

कैसे हुआ यह आत्मसमर्पण?

लातेहार के एसपी अंजनी अंजन ने बताया कि पुलिस लगातार इन नक्सलियों के परिवारों से संपर्क में थी और उन्हें सरकार की नीतियों के बारे में समझा रही थी. पुलिस की कोशिशें रंग लाईं और इन दोनों ने समाज की मुख्य धारा में लौटने का फैसला किया. आत्मसमर्पण के दौरान इन दोनों ने पुलिस को एक एके-47 राइफल, एक इंसास राइफल और कई जिंदा कारतूस भी सौंपे.

भटके हुए युवाओं को पुलिस का संदेश

इस मौके पर पुलिस अधिकारियों ने इलाके के अन्य भटके हुए युवाओं से भी अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्य धारा में लौट आएं. उन्होंने कहा कि सरकार की आत्मसमर्पण नीति उन्हें एक सामान्य जीवन जीने का मौका देती है और प्रशासन उनकी हरसंभव मदद करेगा. जो लोग हथियार नहीं डालेंगे, उनके खिलाफ पुलिस का अभियान और भी तेज किया जाएगा.

यह आत्मसमर्पण न केवल पुलिस के बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे सही नीतियों और संवाद के जरिए नक्सलवाद की कमर तोड़ी जा सकती है.