Akshaya Tritiya 2026 : पांडवों को इसी दिन मिला था चमत्कारी अक्षय पात्र, जानें क्यों इस तिथि पर किए दान का कभी नहीं होता क्षय
News India Live, Digital Desk : हिंदू धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व विशेष महत्व रखता है। इसे केवल सोना खरीदने या मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि इसका सीधा संबंध महाभारत काल की एक बेहद चमत्कारी घटना से भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को ही भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के कष्ट दूर करने के लिए उन्हें 'अक्षय पात्र' भेंट किया था। आइए विस्तार से जानते हैं क्या है इस जादुई पात्र का रहस्य और अक्षय तृतीया की ये पौराणिक कथा।
वनवास में जब पांडवों के सामने आया भोजन का संकट
महाभारत के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वनवास काट रहे थे, तब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके आश्रम में आने वाले अतिथि ब्राह्मणों और ऋषियों का सत्कार करने की थी। उनके पास इतना अन्न नहीं था कि वे प्रतिदिन सैकड़ों लोगों को भोजन करा सकें। ऐसे में धर्मराज युधिष्ठिर ने सूर्य देव की कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें एक तांबे का पात्र दिया, जिसे 'अक्षय पात्र' कहा गया। इस पात्र की खासियत यह थी कि इसमें से भोजन कभी समाप्त नहीं होता था, जब तक कि द्रौपदी स्वयं भोजन न कर ले।
श्रीकृष्ण ने एक चावल के दाने से बचाई पांडवों की लाज
इस पात्र से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प कथा ऋषि दुर्वासा से जुड़ी है। जब दुर्योधन की साजिश के तहत ऋषि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ अचानक पांडवों की कुटिया पर भोजन के लिए पहुंचे, उस समय द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं। पात्र खाली हो चुका था और ऋषि के क्रोध का भय था। संकट की इस घड़ी में द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण को याद किया। कन्हैया ने वहां पहुंचकर पात्र में चिपके हुए केवल एक चावल के दाने को खाया। उनके तृप्त होते ही ऋषि दुर्वासा और उनके शिष्यों का पेट अपने आप भर गया और पांडव उनके श्राप से बच गए।
अक्षय तृतीया पर क्यों जरूरी है दान-पुण्य?
'अक्षय' शब्द का अर्थ ही है जिसका कभी विनाश न हो। मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन दिन पर सतयुग और त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। शास्त्र कहते हैं कि इस तिथि पर किया गया कोई भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ या दान व्यक्ति को अनंत काल तक शुभ फल देता है। जिस प्रकार पांडवों को मिला अक्षय पात्र कभी खाली नहीं होता था, ठीक उसी तरह इस दिन किया गया दान जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की कमी नहीं होने देता।
धार्मिक महत्व: परशुराम जयंती और गंगा अवतरण का संयोग
अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी का प्राकट्य हुआ था। साथ ही इसी दिन पवित्र नदी गंगा का धरती पर अवतरण भी हुआ था। यही कारण है कि इसे अबूझ मुहूर्त कहा जाता है, यानी इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए पंचांग देखने की जरूरत नहीं पड़ती। यदि आप भी अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं, तो इस दिन अन्न, जल और वस्त्र का दान करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।