अभय चौटाला का चौंकाने वाला बयान,भारत में भी हो नेपाल और बांग्लादेश जैसा आंदोलन

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News India Live, Digital Desk : भारतीय राजनीति में बयानों का अपना ही एक अंदाज़ होता है, लेकिन कभी-कभी कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सीधा हलचल पैदा कर देती हैं। हरियाणा के वरिष्ठ नेता और इनेलो (INLD) के चेहरे अभय सिंह चौटाला ने हाल ही में कुछ ऐसा कह दिया है, जिसकी चर्चा अब हर चौराहे पर हो रही है। उन्होंने साफ़ लफ़्जों में कह दिया कि अब वक्त आ गया है कि भारत में भी वैसा ही जन-आंदोलन होना चाहिए जैसा हमने हाल के दिनों में अपने पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश में देखा है।

अब सोचने वाली बात यह है कि एक लोकतांत्रिक देश में, जहाँ चुनाव हर समस्या का समाधान माने जाते हैं, वहां 'क्रांति' जैसे शब्दों का जिक्र क्यों हो रहा है?

क्यों गुस्से में हैं अभय चौटाला?
अगर आप उनके बयानों की गहराई में जाएं, तो इसके पीछे मुख्य रूप से सत्ताधारी पार्टी बीजेपी (BJP) के खिलाफ नाराजगी है। चौटाला का आरोप है कि मौजूदा सरकार देश को धर्म और जाति के नाम पर बांटने का काम कर रही है। उनका मानना है कि किसान हो या आम आदमी, हर कोई सिस्टम से त्रस्त हो चुका है। उनका कहना है कि जिस तरह से बांग्लादेश और नेपाल की जनता सड़कों पर उतरी, वैसी ही 'जागरूकता' और 'ताकत' अब भारतीय जनता को भी दिखानी होगी ताकि संविधान और आम लोगों के हक सुरक्षित रहें।

क्या है पड़ोसी देशों वाला 'संदर्भ'?
बांग्लादेश और नेपाल की राजनीति ने हाल के वर्षों में बड़ी उथल-पुथल देखी है। वहां की जनता ने सीधे तौर पर सत्ता को चुनौती दी और उसे पलटा। अभय चौटाला का इशारा इसी बात की ओर था कि जब सरकारें लोगों की बात सुनना बंद कर देती हैं, तब आख़िरी रास्ता आंदोलन ही बचता है। हालांकि, भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसे एक कड़े राजनीतिक प्रहार के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी समर्थक इसे 'भड़काने' वाली बात कह रहे हैं, तो वहीं विपक्ष का एक हिस्सा इसे बढ़ती नाराजगी का नाम दे रहा है।

किसानों और महंगाई का ज़िक्र
चौटाला का यह बयान सिर्फ हवा-हवाई नहीं है। इसके पीछे साल 2026 के बदलते राजनीतिक समीकरण और ज़मीनी मुद्दे भी हैं। हरियाणा की राजनीति हमेशा से खेती-किसानी के इर्द-गिर्द घूमती है। चौटाला का कहना है कि किसानों को उनके हक नहीं मिल रहे और महंगाई ने मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है। उन्होंने बीजेपी पर हमलावर होते हुए कहा कि यह पार्टी जनता को लड़वाने का कोई मौका नहीं छोड़ती, ऐसे में एकजुट होकर आवाज़ उठाना ज़रूरी है।

अंत में एक बड़ा सवाल
क्या वाकई भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में पड़ोसी देशों जैसी स्थिति पैदा होने की कोई संभावना है? राजनीति के जानकार कहते हैं कि ऐसे बयान अक्सर जनभावनाओं को भुनाने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन ये सिस्टम की उन कमियों की ओर भी इशारा करते हैं जिनसे जनता नाराज़ है। अब देखना यह होगा कि इस बयान पर सत्ता पक्ष की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है और जनता इसे किस तरह लेती है।