AAP का बड़ा दांव, राघव चड्ढा समेत 7 बागियों के खिलाफ राइट टू रिकॉल लाने की तैयारी, हिल जाएगी सियासत
News India Live, Digital Desk:आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर मची रार अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। पार्टी ने अपने ही सात बागी नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए भारतीय राजनीति के सबसे कड़े अस्त्र 'राइट टू रिकॉल' (Right to Recall) का उपयोग करने की मंशा जताई है। इस फेहरिस्त में सबसे चौंकाने वाला नाम राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का है। पार्टी के इस आक्रामक रुख ने न केवल दिल्ली बल्कि देश की सियासत में हलचल तेज कर दी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि यह दांव सफल रहा, तो बागी विधायकों और सांसदों की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है।
गद्दारी बर्दाश्त नहीं: अपनों को ही हटाने की कवायद सूत्रों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी ने उन नेताओं की एक सूची तैयार की है जिन्होंने हाल के दिनों में पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी की या नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोला। पार्टी का तर्क है कि जिन मतदाताओं ने 'आप' की विचारधारा और झाड़ू के निशान पर भरोसा करके इन प्रतिनिधियों को चुना था, अब वे नेता जनता के भरोसे के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। ऐसे में 'राइट टू रिकॉल' के जरिए जनता को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वापस बुला सकें। राघव चड्ढा के अलावा इस लिस्ट में अन्य कद्दावर नाम शामिल हैं, जिन्होंने पार्टी के भीतर गुटबाजी को हवा दी है।
क्या है 'राइट टू रिकॉल' और क्यों मचा है बवाल? 'राइट टू रिकॉल' यानी मतदाता को अपने प्रतिनिधि को पद से हटाने का अधिकार। हालांकि, भारतीय संसदीय प्रणाली में वर्तमान में ऐसा कोई स्पष्ट कानून नहीं है जो सांसदों या विधायकों पर सीधे लागू हो, लेकिन आम आदमी पार्टी शुरू से ही स्वराज और जवाबदेही के नाम पर इसकी वकालत करती रही है। जानकारों का मानना है कि 'आप' इस मुद्दे को हवा देकर बागियों को नैतिक रूप से घेरना चाहती है। पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि यदि आप संगठन के साथ नहीं हैं, तो आपको जनता का प्रतिनिधित्व करने का भी कोई हक नहीं है।
सियासी गलियारों में हड़कंप, बागियों की बढ़ी धड़कनें पार्टी के इस कदम ने राघव चड्ढा और अन्य बागियों के खेमे में खलबली मचा दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो अरविंद केजरीवाल की टीम इस रणनीति के जरिए बागियों को 'इस्तीफा' देने के लिए मजबूर करना चाहती है या फिर उन्हें जनता की नजरों में विलेन साबित करने की तैयारी में है। अगर पार्टी इस मुद्दे पर जनमत संग्रह या कोई बड़ा आंदोलन शुरू करती है, तो आगामी चुनावों में इन नेताओं के लिए राह मुश्किल हो सकती है। फिलहाल, 'राइट टू रिकॉल' का यह जिन्न बोतल से बाहर आने के बाद दिल्ली की राजनीति किस करवट बैठेगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।