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April 24 2026 04:36 am

हिंदू तो हिंदू है, वह किसी भी मंदिर में जा सकता है, सबरीमाला सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना की बड़ी टिप्पणी

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News India Live, Digital Desk : सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला संदर्भ (Sabarimala Reference) मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हिंदू समाज की एकता और मंदिरों में प्रवेश के अधिकार को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। नौ जजों की संविधान पीठ के सामने चल रही इस बहस में उन्होंने स्पष्ट किया कि एक हिंदू अपनी आस्था के आधार पर किसी भी मंदिर में दर्शन करने का अधिकार रखता है और उसे संप्रदायों (Denominations) के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए।

'हिंदू एकता' और मंदिरों की समावेशिता

जस्टिस नागरत्ना ने वरिष्ठ अधिवक्ता वी. गिरि और अन्य वकीलों की दलीलों के जवाब में यह बात कही, जो भगवान अयप्पा के भक्तों को एक अलग 'धार्मिक संप्रदाय' के रूप में पेश कर रहे थे। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, "हिंदू तो हिंदू है, वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।" उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संप्रदायों के आधार पर मंदिरों में भेदभावपूर्ण दीवारें खड़ी की गईं, तो इससे हिंदू समाज की एकता कमजोर होगी और अंततः वे संप्रदाय भी खुद को समाज से अलग-थलग पाएंगे।

संप्रदाय के नाम पर 'बहिष्कार' स्वीकार्य नहीं

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 26 के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों के प्रबंधन की आजादी तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी खास वर्ग (जैसे महिलाओं) को पूरी तरह बाहर करने के लिए नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मंदिरों को 'समावेशी' (Inclusive) होना चाहिए, न कि 'विशिष्ट' (Exclusionary)। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य का काम सामाजिक बुराइयों को दूर करना है, और अगर लोग सुधार चाहते हैं, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।

'छुआछूत' और महिलाओं के सम्मान पर तीखी बात

इससे पहले की सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना ने मासिक धर्म (Menstruation) के आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने सवाल किया था कि क्या किसी महिला को महीने के तीन दिन 'अछूत' माना जा सकता है और चौथे दिन वह 'पवित्र' हो जाती है? उन्होंने कहा कि यह अवधारणा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) और महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है।

क्या है सबरीमाला संदर्भ मामला?

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच इस समय 2018 के सबरीमाला फैसले से उत्पन्न हुए बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है। इसमें न केवल सबरीमाला, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश, पारसी महिलाओं के अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना जैसी प्रथाओं पर भी संविधान की व्याख्या की जा रही है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के नेतृत्व वाली यह पीठ धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) और लैंगिक समानता के बीच संतुलन तलाश रही है।

आने वाले समय पर असर

जस्टिस नागरत्ना की इस टिप्पणी को हिंदू समाज के भीतर सुधार और एकीकरण की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है। उनके अनुसार, मंदिर किसी एक छोटे समूह की जागीर नहीं, बल्कि पूरे समाज की आस्था का केंद्र हैं। इस मामले की अगली सुनवाई में कोर्ट धर्म और अंधविश्वास के बीच की बारीक रेखा पर भी मंथन करेगा।