एक धोखा, एक साजिश: भारत और अफगानिस्तान की उस भूली-बिसरी सीमा की कहानी, जिसे जानना जरूरी

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India-Afghanistan border history : पिछले कुछ दिनों से अफगानिस्तान एक बार फिर भारतीय अखबारों की सुर्खियों में है। कभी तालिबान के नेताओं का भारत दौरा, कभी देवबंद के मदरसे में उनका पहुंचना, तो कभी अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच शुरू हुई हिंसक झड़पें। इन सब हलचलों के बीच एक ऐसी बात फिर से सामने आई है, जिसे हम और आप शायद भूल ही चुके हैं - भारत और अफगानिस्तान के बीच 106 किलोमीटर लंबी सीमा!

जी हां, आपने सही पढ़ा। भारत के संविधान और गृह मंत्रालय के दस्तावेजों के अनुसार, भारत सात देशों के साथ अपनी सीमा साझा करता है, और उनमें से एक अफगानिस्तान भी है। लेकिन अगर ऐसा है, तो हम वहां क्यों नहीं हैं? इस सीमा तक हमारी पहुंच क्यों नहीं है? इसकी कहानी एक भूली-बिसरी साजिश और धोखे में छिपी है।

कहानी उस धोखे की, जिससे हमने अपनी सीमा खो दी

यह कहानी शुरू होती है आजादी के ठीक बाद, 1947 में। जब महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के विशाल राज्य का विलय भारत में किया, तो इसमें गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाका भी शामिल था। यही वह इलाका है जिसकी सीमा अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर से लगती है।

आजादी के बाद, महाराजा ने ब्रिगेडियर घनशरा सिंह को गिलगित-बाल्टिस्तान का गवर्नर नियुक्त किया। लेकिन वहां तैनात गिलगित स्काउट्स का कमांडिंग ऑफिसर एक अंग्रेज था - मेजर विलियम अलेक्जेंडर ब्राउन। जैसे ही महाराजा ने भारत में विलय की घोषणा की, इस अंग्रेज अफसर ने एक बड़ी साजिश रची। उसने अपने मुस्लिम सैनिकों के साथ मिलकर बगावत कर दी, भारतीय गवर्नर को घर में ही कैद कर लिया और रियासत के झंडे को उतारकर वहां पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया।

यह अंग्रेजों की तरफ से भारत की पीठ में छुरा घोंपने जैसा था। दो दिन के अंदर ही पाकिस्तान ने वहां अपना सैन्य गवर्नर भेज दिया और उस पूरे इलाके को अपने कब्जे में ले लिया, जिसे आज हम पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) का हिस्सा मानते हैं। इस धोखे के लिए मेजर ब्राउन को बाद में ब्रिटेन और पाकिस्तान, दोनों ने सम्मानित किया।

क्या है यह वाखान कॉरिडोर, जो हमें अफगानिस्तान से जोड़ता है?

वाखान कॉरिडोर अफगानिस्तान का एक पतला सा पहाड़ी गलियारा है, जो चीन को ताजिकिस्तान और पाकिस्तान से अलग करता है। इसी कॉरिडोर की 75 किलोमीटर लंबी सीमा हमारे गिलगित-बाल्टिस्तान से लगती है। यह ऐतिहासिक सिल्क रूट का हिस्सा था और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।

अब हम इस पर दोबारा बात क्यों कर रहे हैं?

लंबे समय तक भारत ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। लेकिन अब चीजें बदल रही हैं।

  1. सरकार का बदला रुख: जब गृह मंत्री अमित शाह ने CAA कानून पर बोलते हुए अफगानिस्तान के हिंदुओं और सिखों का जिक्र किया, तो उन्होंने इस भूली हुई सीमा की याद दिलाई।
  2. तालिबान से बातचीत: अब भारत तालिबान से सीधे बात कर रहा है। हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर और तालिबान के नेता आमिर खान मुत्ताकी ने एक संयुक्त बयान में वाखान को अपना "निकटतम पड़ोसी" माना। यह एक बहुत बड़ा कूटनीतिक संदेश है।
  3. पाकिस्तान-अफगानिस्तान में तनाव: आज जब तालिबान और पाकिस्तान के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं, तो यह भारत के लिए अपने पुराने और ऐतिहासिक संबंधों को फिर से जिंदा करने का एक मौका है।

पाकिस्तान की नई चाल और भारत की चिंता

पाकिस्तान पिछले 75 सालों से गिलगित-बाल्टिस्तान की आबादी का मिजाज बदलने की कोशिश कर रहा है। वह बाहर से सुन्नी और पंजाबी लोगों को वहां बसाकर स्थानीय शिया आबादी को अल्पसंख्यक बना रहा है। यह भारत के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि भारत आज भी इस पूरे इलाके पर अपना दावा करता है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज भी PoJK और गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए 24 सीटें खाली रखी गई हैं।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विदेश नीति में कोई हमेशा के लिए दोस्त या दुश्मन नहीं होता, सिर्फ देश के हित स्थायी होते हैं। भारत और अफगानिस्तान की यह भूली-बिसरी सीमा सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि इतिहास, रणनीति और भविष्य के मौकों का एक बड़ा अध्याय है, जिसे अब फिर से पढ़ने का समय आ गया है।