ट्रंप-जिनपिंग की महामुलाकात, जिनपिंग ने क्यों दिया थ्यूसीडाइड्स ट्रैप का हवाला?
बीजिंग के भव्य गलियारों में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने आए, तो पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई थीं। ताइवान से लेकर व्यापार युद्ध तक के भारी तनाव के बीच, इस ऐतिहासिक बैठक में जिनपिंग ने एक ऐसा शब्द उछाला जिसने कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। वह शब्द है 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' (Thucydides Trap)।
चीनी राष्ट्रपति ने ट्रंप से सीधे लहजे में पूछा कि क्या दुनिया की ये दो सबसे बड़ी ताकतें इस 'ट्रैप' से ऊपर उठकर स्थिरता का एक नया मॉडल पेश कर सकती हैं? उनके इस बयान के पीछे एक गहरी चेतावनी और भविष्य की रणनीति छिपी हुई है।
आखिर क्या है यह 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप'?
'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' का विचार 2,500 साल पुराने यूनानी इतिहास से आता है। हार्वर्ड के प्रसिद्ध राजनीति विज्ञानी ग्राहम एलिसन ने इसे आधुनिक संदर्भ में लोकप्रिय बनाया। यह प्राचीन इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स के उस विश्लेषण पर आधारित है, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे उभरते हुए 'एथेंस' और स्थापित महाशक्ति 'स्पार्टा' के बीच का डर युद्ध की वजह बना था।
आसान शब्दों में कहें तो, जब कोई उभरती हुई शक्ति (चीन) किसी स्थापित महाशक्ति (अमेरिका) के वर्चस्व को चुनौती देती है, तो दोनों के बीच टकराव की संभावना 90% से अधिक हो जाती है, भले ही दोनों पक्ष युद्ध न चाहते हों।
चीन ने खुद को बताया अमेरिका के बराबर की महाशक्ति
जानकारों का मानना है कि ट्रंप के सामने इस मुहावरे का जिक्र कर जिनपिंग ने एक बड़ा दांव खेला है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिया है कि चीन अब अमेरिका से कमतर नहीं है, बल्कि उसके बराबर की महाशक्ति है। AI, सेमीकंडक्टर तकनीक, नौसेना विस्तार और ग्लोबल ट्रेड में चीन की बढ़ती पैठ ने उन तमाम क्षेत्रों में अमेरिका को चुनौती दी है, जहां दशकों से वाशिंगटन का एकछत्र राज था।
टकराव के बीच सहयोग की तलाश या चेतावनी?
शी जिनपिंग ने पहले भी कई बार इस शब्द का इस्तेमाल किया है, लेकिन ट्रंप के साथ उनकी बातचीत में इसके मायने बदल गए हैं। ट्रंप सरकार के दौरान चीन पर कड़े व्यापारिक प्रतिबंध, साइबर सुरक्षा के आरोप और ताइवान को लेकर अमेरिकी आक्रामकता ने 'थ्यूसीडाइड्स ट्रैप' जैसी परिस्थितियों को जन्म दे दिया है। जिनपिंग का संदेश साफ है अगर दोनों देश ऐसा रास्ता नहीं खोजते जो 'विन-विन' (दोनों की जीत) वाला हो, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।
क्या टलेगा महाशक्तियों का युद्ध?
बैठक के दौरान जिनपिंग ने जोर देकर कहा कि मानवता का भविष्य और वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या बीजिंग और वाशिंगटन एक-दूसरे के उदय को स्वीकार कर पाते हैं। अमेरिका ने जिस तरह से तकनीक और निर्यात पर पाबंदियां बढ़ाई हैं, उसने चीन को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि ट्रंप इस 'ट्रैप' से बचने के लिए क्या कदम उठाते हैं या फिर आने वाले दिनों में यह आर्थिक रेस एक सैन्य संघर्ष की ओर बढ़ जाएगी।