संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर पर रूस का बड़ा बयान, एर्दोगन की मांग खारिज

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो पावर पर रूस का बड़ा बयान, एर्दोगन की मांग खारिज

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मोर्चे पर एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों और वीटो पावर के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तयिप एर्दोगन द्वारा UNSC में वीटो पावर की व्यवस्था को समाप्त करने और मौजूदा ढांचे में बड़े बदलाव की लगातार उठाई जा रही मांगों को रूस ने सिरे से खारिज कर दिया है। मास्को की ओर से आए इस स्पष्ट बयान के बाद वैश्विक राजनीति में एक नया भूचाल आ गया है, क्योंकि रूस ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र के सबसे ताकतवर निकाय में भारत की स्थायी सदस्यता और व्यापक सुधारों के लिए अपना पुरजोर समर्थन दोहराया है। रूस के इस रुख से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति और अधिक मजबूत हुई है, वहीं तुर्किए और अन्य पश्चिमी देशों के दबाव की राजनीति को करारा झटका लगा है।

रूस का स्पष्ट संदेश, वीटो पावर खत्म करने की मांग को नकारा

मास्को ने हाल ही में अपने आधिकारिक रुख को स्पष्ट करते हुए यह साफ कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P5) के पास मौजूद वीटो पावर को खत्म करने या उसमें कटौती करने का कोई औचित्य नहीं है। तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन लंबे समय से यह कहते आ रहे हैं कि "दुनिया पांच देशों से बड़ी है" और उन्हें वीटो पावर समाप्त करके ग्लोबल साउथ के देशों को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। हालांकि, रूस के वरिष्ठ राजनयिकों और अधिकारियों का मानना है कि सुरक्षा परिषद के मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति ही इस वैश्विक संस्था के संतुलन को बनाए रखने का मुख्य आधार है। यदि इसमें बिना सोचे-समझे बदलाव किया गया, तो संयुक्त राष्ट्र की निर्णय लेने की क्षमता और अधिक कमजोर हो जाएगी, जिससे वैश्विक शांति और सुरक्षा के प्रयासों को बड़ा धक्का लग सकता है।

तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगन की महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका

तुर्किए के राष्ट्रपति रेचेप तयिप एर्दोगन लगातार वैश्विक मंचों पर खुद को इस्लामिक दुनिया और विकासशील देशों के बड़े नेता के रूप में पेश करने की कोशिश करते रहे हैं। इसी रणनीति के तहत वे यूएनएससी में सुधारों के नाम पर वीटो पावर को समाप्त करने या उसका विस्तार करने की मांग उठाते रहे हैं ताकि तुर्किए जैसे देशों को भी सुरक्षा परिषद में प्रत्यक्ष दखल मिल सके। लेकिन रूस द्वारा उनकी इस मांग को सार्वजनिक रूप से खारिज किए जाने के बाद एर्दोगन की कूटनीतिक रणनीतियों को तगड़ा झटका लगा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस का यह रुख यह संदेश देने के लिए पर्याप्त है कि वैश्विक व्यवस्था में केवल बयानों से बदलाव नहीं होते, बल्कि महाशक्तियों के भू-राजनीतिक समीकरण और रणनीतिक हित ही अंतिम फैसले तय करते हैं।

भारत की स्थायी सदस्यता का सबसे मजबूत और पुराना समर्थक है रूस

रूस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का सबसे विश्वसनीय और पुराना समर्थक है। मास्को का मानना है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत जैसी उभरती हुई आर्थिक और सामरिक महाशक्ति को यूएनएससी का स्थायी सदस्य बनाया जाना न सिर्फ जरूरी है, बल्कि यह वैश्विक न्याय के भी अनुकूल है। रूस ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि भारत के बिना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों की कोई भी रूपरेखा अधूरी है। जिस समय पश्चिमी देश और अन्य क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धी भारत की राह में रोड़े अटकाने की कोशिश करते हैं, ठीक उसी समय रूस का यह मजबूत समर्थन भारत के पक्ष में एक बड़ा कूटनीतिक हथियार साबित होता है।

वैश्विक भू-राजनीति और भविष्य के सुरक्षा परिषद सुधारों की दिशा

वर्तमान समय में जब पूरी दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संकट और अमेरिका-चीन के बीच तनातनी जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रही है, तब संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में यूएनएससी के सुधारों का मुद्दा केवल कागजी बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक सत्ता के हस्तांतरण का केंद्र बन गया है। एक तरफ जहां तुर्किए और कुछ अन्य देश अपने एजेंडे के तहत बदलाव चाहते हैं, वहीं रूस और भारत जैसी पारंपरिक साझेदार शक्तियां मौजूदा संस्थागत ढांचे के भीतर ही संतुलित और न्यायसंगत विस्तार की पक्षधर हैं। रूस का यह बयान आने वाले समय में संयुक्त राष्ट्र महासभा और अन्य अंतरराष्ट्रीय बैठकों में एक बहुत बड़ा कूटनीतिक मोड़ साबित हो सकता है, जिससे भारत के लिए रास्ते और अधिक सुगम हो सकते हैं।