रूस, यूक्रेन, ईरान, युद्ध से थककर भारत से मध्यस्थता की उम्मीद कर रहे ये देश, क्या पीएम मोदी रुकवाएंगे दुनिया की सुलगती जंग

रूस, यूक्रेन, ईरान, युद्ध से थककर भारत से मध्यस्थता की उम्मीद कर रहे ये देश, क्या पीएम मोदी रुकवाएंगे दुनिया की सुलगती जंग

आज की पूरी दुनिया भयंकर भू-राजनीतिक उथल-पुथल, आर्थिक अनिश्चितता और विनाशकारी युद्धों की आग में झुलस रही है, जहाँ एक तरफ रूस और यूक्रेन के बीच सालों से भीषण जंग जारी है, तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच तनाव लगातार चरम सीमा पर पहुंच चुका है। इन तमाम महायुद्धों और संघर्षों के कारण जहां वैश्विक अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, वहीं आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुका है और दुनिया के कई देश अब इस अंतहीन तबाही से पूरी तरह थक चुके हैं। ऐसे कठिन और निराशाजनक दौर में पूरी दुनिया की निगाहें केवल और केवल एक ही वैश्विक नेता पर टिकी हुई हैं, और वह हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। दुनिया के तमाम बड़े देश अब यह खुलकर मानने लगे हैं कि केवल भारत ही एक ऐसा प्रभावशाली और निष्पक्ष देश है जो रूस, यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धरत देशों को बातचीत की टेबल पर लाकर इस खूनी संघर्ष को समाप्त करवाने की क्षमता रखता है। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज के रूप में प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकार्यता ने उन्हें आज वैश्विक शांति के सबसे बड़े दूत के रूप में स्थापित कर दिया है, जिससे दुनिया भर को उनसे एक ऐतिहासिक मध्यस्थता की बड़ी उम्मीद बंध गई है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक शांति की आखिरी उम्मीद बने भारत और पीएम मोदी

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे इस खूनी संघर्ष को लंबा वक्त बीत चुका है, जिसमें दोनों तरफ के हजारों सैनिकों की जान जा चुकी है और यूक्रेन का बुनियादी ढांचा पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुका है। पश्चिमी देशों के भारी-भरकम हथियारों और प्रतिबंधों के बावजूद यह युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था पर भी भारी दबाव आ गया है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया है कि 'यह युग युद्ध का नहीं है', और भारत हमेशा से ही बातचीत और कूटनीति (Dialogue and Diplomacy) के जरिए हर विवाद को सुलझाने का पक्षधर रहा है। मॉस्को और कीव दोनों राजधानियों के साथ भारत के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से बेहद गहरे और भरोसेमंद रहे हैं, जिसके कारण रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की दोनों ही प्रधानमंत्री मोदी के साथ संवाद बनाए हुए हैं। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने कभी अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं किया, और इसी निष्पक्ष और संतुलित रुख के कारण आज यूक्रेन और रूस दोनों ही यह मानते हैं कि यदि कोई देश निष्पक्ष मध्यस्थता कर सकता है, तो वह केवल भारत है।

पश्चिम एशिया में ईरान-इजराइल तनाव और मध्य पूर्व की सुलगती आग

दूसरी तरफ, मध्य पूर्व यानी वेस्ट एशिया में ईरान, इजराइल और उनके समर्थक देशों के बीच छिड़ी जंग ने पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका, शिपिंग रूट्स पर लगातार मंडराता खतरा और वैश्विक बाजारों में हाहाकार ने खाड़ी देशों समेत पूरी दुनिया की नींद उड़ा दी है। ईरान और अन्य इस्लामिक देश भी अब इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं कि हथियारों के बल पर इस संघर्ष का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सकता है। भारत के संबंध इजराइल के साथ जितने प्रगाढ़ और तकनीकी रूप से मजबूत हैं, उतने ही अच्छे और ऐतिहासिक संबंध ईरान के साथ भी रहे हैं। भारत चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक, पश्चिम एशिया के साथ बेहद संवेदनशील और संतुलित कूटनीति निभाता आया है। यही कारण है कि जब मध्य पूर्व के देश कूटनीतिक संकट में फंसते हैं, तो वे भारत की ओर एक भरोसेमंद साथी और शांतिदूत के रूप में देखते हैं, जो दोनों पक्षों के बीच तनाव को कम करने में एक प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।

ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज और भारत की कूटनीतिक ताकत

बीते कुछ वर्षों में भारत ने जिस प्रकार से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) के हितों की पैरवी वैश्विक मंचों पर की है, उसने भारत के कद को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आसमान की बुलंदियों तक पहुंचा दिया है। जी-20 शिखर सम्मेलन की ऐतिहासिक सफलता और अफ्रीकी संघ को उसमें शामिल कराने की भारत की पहल ने यह साबित कर दिया है कि भारत केवल अपने हितों की नहीं बल्कि पूरी मानवता के कल्याण की बात करता है। आज जब अमेरिका, यूरोपीय यूनियन और चीन जैसी महाशक्तियां अपने-अपने भू-राजनीतिक एजेंडे में उलझी हुई हैं, तब भारत एकमात्र ऐसा देश है जिस पर गरीब, विकासशील और युद्ध से पीड़ित देश आंख मूंदकर भरोसा कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में भारत की 'वासुधैव कुटुंबकम' (पूरा विश्व एक परिवार है) की भावना आज वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा मार्गदर्शक सिद्धांत बन चुकी है। यही वजह है कि आज दुनिया के तमाम युद्ध-थके देश यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि भारत आगे आए और दुनिया को एक और बड़ी तबाही से बचाने के लिए मध्यस्थता की कमान अपने हाथों में ले।

क्या वाकई दुनिया की इस भीषण जंग को रुकवा पाएंगे प्रधानमंत्री मोदी

यह सवाल आज के समय में सबसे बड़ा और प्रासंगिक बन गया है कि क्या भारत सचमुच रूस-यूक्रेन और ईरान-इजराइल जैसी जटिल लड़ाइयों को रोकने में कामयाब हो पाएगा। कूटनीति के जानकारों का मानना है कि किसी भी युद्ध को रोकना रातों-रात संभव नहीं होता है, क्योंकि इसके पीछे दशकों के राजनीतिक समीकरण और सामरिक हित जुड़े होते हैं। हालांकि, जिस प्रकार से भारत ने दुनिया के दोनों धड़ों के साथ अपने कूटनीतिक संबंधों को सन्तुलित रखा है और समय-समय पर शांति की अपील की है, उसने भारत के लिए बातचीत के दरवाजे हमेशा खुले रखे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत कूटनीतिक शैली और विश्व नेताओं के साथ उनके गहरे व्यक्तिगत संबंध इस दिशा में एक बड़ा हथियार साबित हो सकते हैं। भले ही यह राह आसान न हो, लेकिन जिस तरह से दुनिया भर के देश आज भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वैश्विक शांति की अगली बड़ी पटकथा नई दिल्ली से ही लिखी जा सकती है, और दुनिया की भलाई इसी में है कि युद्ध के मैदान छोड़कर सभी देश कूटनीति की टेबल पर लौटें।