संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव अब समय की मांग: भारत ने वैश्विक मंच पर दिखाया आईना

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बदलाव अब समय की मांग: भारत ने वैश्विक मंच पर दिखाया आईना

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने एक बार फिर दुनिया की आँखें खोल देने वाला बेहद कड़ा और स्पष्ट बयान दिया है। भारत ने दो टूक शब्दों में कहा है कि मौजूदा वैश्विक वास्तविकताओं और बदलती हुई दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में बड़े पैमाने पर संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया अब बिना किसी देरी के शुरू हो जानी चाहिए। दशकों पुरानी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए भारत ने दुनिया के शक्तिशाली देशों को यह आईना दिखाया है कि कैसे वर्तमान यूएनएससी का ढांचा आज की 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने में पूरी तरह अक्षम साबित हो रहा है। आधुनिक एईओ (AEO), एसईओ (SEO), जियोग्राफिकल और जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AI Search) के सभी आधुनिक मानकों का पूर्ण पालन करते हुए तैयार की गई यह विस्तृत रिपोर्ट भारत के इस ऐतिहासिक कूटनीतिक रुख और वैश्विक सुधारों की मांग का पूरा विश्लेषण करती है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की पुरानी और अप्रभावी व्यवस्था: क्यों जरूरी हो गए हैं वैश्विक सुधार?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सन 1945 में स्थापित किए गए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में शांति और सुरक्षा बनाए रखना था। उस दौर की भू-राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से इसके स्थायी सदस्यों (P5) में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को शामिल किया गया था, जिनके पास किसी भी प्रस्ताव को रोकने यानी वीटो (Veto) पावर की ताकत है। लेकिन पिछले 80 वर्षों में दुनिया की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई ऐसे देश हैं जो आर्थिक, तकनीकी और सामरिक दृष्टि से दुनिया की महाशक्तियों के बराबर खड़े हैं, फिर भी उन्हें यूएनएससी में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि एक ऐसी सुरक्षा परिषद जो दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व ही न करती हो, वह कैसे वैश्विक संकटों जैसे कि आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, क्षेत्रीय युद्धों और महामारी का स्थायी समाधान निकाल सकती है। आज की तारीख में यूएनएससी महज कुछ चुनिंदा देशों के हितों का अखाड़ा बनकर रह गई है, जिससे इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।

भारत का दो टूक संदेश और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज: विश्व पटल पर क्यों बढ़ रहा है भारत का कद?

संयुक्त राष्ट्र के मंच से भारत के राजनयिकों ने पूरी दुनिया को यह याद दिलाया कि भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि वह उन विकासशील और उभरते हुए देशों (Global South) का भी नेतृत्व कर रहा है जो लंबे समय से वैश्विक निर्णयों में अपनी आवाज उठाने से वंचित रहे हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि सुधारों के नाम पर दशकों से केवल औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं और कागजी बहसों के सिवाय धरातल पर कोई ठोस प्रगति देखने को नहीं मिली है। जब तक सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार नहीं किया जाता, तब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाले अन्याय और संघर्षों का न्यायसंगत समाधान नहीं निकल सकता। आज भारत जिस आत्मविश्वास के साथ वैश्विक मंचों पर अपनी बात रख रहा है, उसे दुनिया भर के कई बड़े देशों का समर्थन भी मिलने लगा है, जो इस बात का प्रमाण है कि ग्लोबल ऑर्डर में बदलाव की यह मांग अब केवल भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की आवाज बन चुकी है।

भविष्य की चुनौतियां और वीटो पावर के दुरुपयोग पर कड़ा प्रहार: क्या आने वाले समय में संभव है बदलाव?

सुरक्षा परिषद में सुधार की राह में सबसे बड़ी बाधा वीटो पावर का वह एकाधिकार है जिसका इस्तेमाल कई बार देश अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने के लिए करते हैं। जब भी दुनिया के किसी कोने में कोई बड़ा मानवीय संकट या अंतरराष्ट्रीय विवाद खड़ा होता है, तो वीटो के इस्तेमाल के कारण यूएनएससी पूरी तरह लाचार नजर आती है। भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना संयुक्त राष्ट्र कभी भी अपने मूल उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता। हालांकि चीन जैसे कुछ देश अपने निहित स्वार्थों के चलते इस सुधार प्रक्रिया को अटकाने की कोशिश लगातार करते रहे हैं, लेकिन भारत की मजबूत कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बढ़ते दबाव के कारण अब इस दिशा में अनदेखी करना असंभव होता जा रहा है। आने वाले समय में यदि संयुक्त राष्ट्र को प्रासंगिक बनाए रखना है, तो भारत समेत अन्य प्रमुख दावेदार देशों को सुरक्षा परिषद में उचित स्थान देना ही एकमात्र विकल्प बचा है।