पशुओं से इंसानों में पहुंचे जानलेवा संक्रमण से मरीज की मौत
दुनियाभर में एक बार फिर से किसी अज्ञात और खतरनाक वायरस के इंसानों में प्रवेश करने की खबर ने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य महकमे की चिंताएं बढ़ा दी हैं। यूरोप के विकसित देश फ्रांस से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां आमतौर पर पशुओं को अपना शिकार बनाने वाला 'शमोंडा वायरस' (Shamonda Virus) अब इंसानों की देह में भी सेंध लगाने में कामयाब हो गया है। फ्रांस में इस जानलेवा वायरस से संक्रमित एक मरीज की दर्दनाक मौत के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मच गया है। हालांकि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि यह एक अपवादस्वरूप मामला है, लेकिन पशुओं से इंसानों (Zoonotic Disease) में इस तरह वायरस का ट्रांसफर होना भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य यूरोपीय स्वास्थ्य एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।
क्या है शमोंडा वायरस और पशुओं में इसके लक्षण?
चिकित्सा विज्ञान और virology के जानकारों के अनुसार, शमोंडा वायरस मुख्य रूप से ऑर्थोबुन्यावायरस (Orthobunyavirus) परिवार और सिम्बु सेरोग्रुप से संबंधित एक कीट-जनित वायरस है। ऐतिहासिक रूप से इस वायरस का इतिहास इंसानों में कभी नहीं पाया गया था, बल्कि यह दशकों से अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में मुख्य रूप से मवेशियों (गायों, भेड़ों, बकरियों और घोड़ों) को ही प्रभावित करता रहा है। संक्रमित पशुओं में इस वायरस के कारण तेज बुखार, गंभीर दस्त (diarrhea), सुस्ती, और दूध उत्पादन में भारी गिरावट जैसी समस्याएं देखी जाती हैं। इसके अलावा गर्भवती मवेशियों में यह गर्भपात या भ्रूण संबंधी गंभीर विकृतियों का कारण भी बनता है। यूरोप के कई देशों में गर्मियों के मौसम में मवेशियों के बीच इस वायरस के फैलने की पुष्टि पहले ही हो चुकी थी, लेकिन किसी ने यह कल्पना नहीं की थी कि यह दायरा पार करके इंसानों तक पहुंच जाएगा।
कैसे इंसानों तक पहुंचा यह वायरस? फ्रांस के पहले मामले की पूरी सच्चाई
फ्रांस के स्वास्थ्य और कृषि मंत्रालयों द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह अपनी तरह का दुनिया का पहला प्रलेखित मामला है जब कोई इंसान शमोंडा वायरस की चपेट में आया है। शुरुआती epidemiological जांच में यह बात सामने आई है कि पूर्वी फ्रांस में रहने वाला यह मरीज संभवतः एक खास तरह की छोटी मक्खी यानी 'कुलिकोइड्स मिज' (Culicoides midge) के काटने से संक्रमित हुआ था। यह छोटे कीड़े या मक्खियां ही पशुओं के बीच इस वायरस को फैलाने के मुख्य वाहक माने जाते हैं। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जिस मरीज की मौत हुई है, वह पहले से ही किसी अन्य गंभीर और जटिल बीमारी से जूझ रहा था और उसकी इम्युनिटी बेहद कमजोर (immunocompromised) थी। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण वायरस ने उसके मस्तिष्क (brain) को बुरी तरह प्रभावित किया, जिससे उसकी जान चली गई।
क्या आम जनता के लिए है कोई बड़ा खतरा? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ
जैसे ही फ्रांस में इस मरीज की मौत की खबर मीडिया में आई, आम लोगों के मन में कोविड जैसी किसी नई महामारी का डर बैठना स्वाभाविक था। इस डर को दूर करते हुए फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आम जनता के लिए घबराने की कोई बात नहीं है। अब तक की गई वैज्ञानिक जांच में इस बात के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैल सकता है। यह एक छिटपुट और असाधारण 'स्पिलओवर' (Spillover Event) यानी प्रजाति लांघने की घटना है, जहां वायरस ने कीट के जरिए असामान्य रूप से एक कमजोर इंसान के शरीर में प्रवेश कर लिया। फिर भी, यूरोपीय सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (ECDC) और अन्य मेडिकल रिसर्च संस्थान यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस वायरस के म्यूटेशन या जेनेटिक बदलाव से इंसानों को भविष्य में कोई बड़ा खतरा हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन और पशुजन्य रोगों (Zoonotic Diseases) का बढ़ता संकट
शमोंडा वायरस का इंसानों में पाया जाना इस बात का ताजा प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण में हो रहे बदलावों के कारण किस प्रकार पशुओं की बीमारियां अब इंसानों की दुनिया में दस्तक दे रही हैं। जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, कीट-पतंगे और विशेष रूप से काटने वाली मक्खियां और मच्छर नए क्षेत्रों में फैल रहे हैं, जिससे वायरस के ट्रांसमिशन का दायरा भी व्यापक होता जा रहा है। वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों ने विशेष रूप से फार्म हाउसों में काम करने वाले लोगों और पशु पालकों को सलाह दी है कि वे कीटों के काटने से बचाव के पूरे उपाय अपनाएं, जैसे कि शरीर को पूरी तरह ढकने वाले कपड़े पहनना, कीट-निवारक क्रीम (insect repellents) का इस्तेमाल करना और खिड़कियों पर जाली लगाना। यद्यपि अभी इंसानों के लिए इस वायरस की कोई विशेष वैक्सीन या इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन इस घटना ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों को भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए अधिक सतर्क और चौकन्ना कर दिया है।