मदरसे के निर्माण के लिए पाकिस्तान ने ढहा दिया 100 साल पुराना ऐतिहासिक हिंदू मंदिर, भारत के कड़े सवाल उठाते ही बौखलाया ड्रैगन
पाकिस्तान की जमीन पर अल्पसंख्यक हिंदुओं और उनके धार्मिक स्थलों पर होने वाले अत्याचारों की फेहरिस्त में एक और शर्मनाक और घृणित अध्याय जुड़ चुका है। कट्टरपंथी ताकतों और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से पाकिस्तान के एक इलाके में सौ साल से भी अधिक पुराने ऐतिहासिक हिंदू मंदिर को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया, और उस पवित्र भूमि पर एक अवैध मदरसे का निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है। जब भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस क्रूरता और धार्मिक स्थलों के विध्वंस पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई और पाकिस्तान से कड़े सवाल पूछे, तो हमेशा की तरह पाकिस्तानी हुक्मरान और विदेश मंत्रालय अपनी करतूतों पर पर्दा डालने के लिए बुरी तरह तिलमिला उठे। वे दुनिया के सामने आने वाले इस भयानक सच को स्वीकार करने के बजाय खुलेआम सफेद झूठ बोलने लगे और अपनी हरकतों को सही ठहराने का असफल प्रयास करने लगे। पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है, जहां एक तरफ अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के झूठे दावे किए जाते हैं, तो दूसरी तरफ उनकी आस्था के केंद्रों को बुलडोजर से रौंदकर जमींदोज किया जा रहा है।
पाकिस्तान में कैसे दिया गया इस ऐतिहासिक मंदिर को तोड़ने का खौफनाक अंजाम
यह पूरी निंदनीय घटना पाकिस्तान के एक ऐसे क्षेत्र की है जहां पहले से ही हिंदू और सिख समुदायों की आबादी बेहद कम बची है और जो लोग वहां किसी तरह जीवन बिता रहे हैं, वे रोज डर के साये में जीने को मजबूर हैं। स्थानीय कट्टरपंथी संगठनों और भू-माफियाओं की नजरें इस प्राचीन सौ साल पुराने मंदिर की बेशकीमती जमीन पर लंबे समय से गड़ी हुई थीं, क्योंकि वे इस सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर को मिटाकर वहां अपनी कट्टरपंथी गतिविधियों का केंद्र खड़ा करना चाहते थे। बिना किसी कानूनी अनुमति या प्रशासनिक नोटिस के अचानक भारी मशीनरी और बुलडोजर लेकर पहुंचे उपद्रवियों ने इस ऐतिहासिक मंदिर की प्राचीन दीवारों, मूर्तियों और पवित्र परिसरों को कुछ ही घंटों में मलबे के ढेर में बदल दिया। इस दौरान वहां मौजूद स्थानीय हिंदुओं ने जब इसका विरोध किया तो उन्हें चुप कराने के लिए झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकियां दी गईं और पुलिस ने भी मूकदर्शक बनकर पूरी घटना में हमलावरों का साथ दिया। मंदिर के टूटने से वहां रहने वाले अल्पसंख्यक परिवारों के दिलों पर जो गहरी चोट पहुंची है, उसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, क्योंकि यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं बल्कि उनकी आस्था की आखिरी निशानी था।
भारत के कड़े ऐतराज पर पाकिस्तान की बौखलाहट और बेशर्म झूठ
जैसे ही भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान में इस प्राचीन हिंदू मंदिर के विध्वंस और उसकी जगह मदरसा बनाए जाने के इस गंभीर मामले पर कड़ा संज्ञान लेते हुए तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, पाकिस्तानी प्रशासन में हड़कंप मच गया। अपनी अंतरराष्ट्रीय किरकिरी होते देख पाकिस्तान के विदेश विभाग ने तुरंत एक मनगढ़ंत और हास्यास्पद बयान जारी किया जिसमें इस पूरी घटना से ही किनारा करने की कोशिश की गई। पाकिस्तानी अधिकारियों ने बेशर्मी से झूठ बोलते हुए यह दावा करना शुरू कर दिया कि वहां कोई पुराना मंदिर था ही नहीं और वह जमीन विवादित थी जिस पर अवैध कब्जा हटाया गया है। दुनिया जानती है कि पाकिस्तान में जब भी अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों पर बुलडोजर चलता है या जबरन कब्जा किया जाता है, वहां की सरकार और न्यायपालिका हमेशा लीपापोती करने में जुट जाती है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को आईना दिखाते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि पाकिस्तान अपने यहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने में पूरी तरह विफल रहा है और उसकी यह फितरत उसकी वैचारिक दिवालियापन को दर्शाती है।
अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्म और पाकिस्तान का खोखला संविधान
पाकिस्तान के संविधान में भले ही कागजों पर अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके पूजा स्थलों की सुरक्षा की लंबी-चौड़ी बातें लिखी हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। आए दिन पाकिस्तान के सिंध और पंजाब प्रांतों से हिंदू और ईसाई लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और उनके मंदिरों पर हमलों की दिल दहला देने वाली खबरें सामने आती रहती हैं। सरकार और पुलिस प्रशासन का रवैया हमेशा से हमलावरों के प्रति नरम और पीड़ितों के प्रति उदासीन रहा है, जिसके कारण इन कट्टरपंथी तत्वों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं। सौ साल पुराने मंदिर को तोड़कर वहां मदरसा खड़ा करने की यह घटना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों की संस्कृति, इतिहास और उनकी पहचान को मिटाने का एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित षड्यंत्र चलाया जा रहा है। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन इस बात की बार-बार निंदा कर चुके हैं कि जिस देश में बहुसंख्यक समाज के इशारे पर अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाता हो, वहां लोकतंत्र और मानवाधिकार की बात करना केवल एक दिखावा मात्र रह जाता है।
वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान का बेनकाब चेहरा और न्याय की उम्मीद
आज जब पाकिस्तान खुद अपनी आंतरिक कलह, गंभीर आर्थिक संकट, भुखमरी और आतंकवाद की आग में पूरी तरह जल रहा है, तब भी उसकी फितरत में कोई सुधार नहीं आया है। देश की अवाम दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है, लेकिन वहां की हुकूमत और कट्टरपंथी ताकतें अभी भी मंदिरों को तोड़ने और नफरत फैलाने के अपने पुराने एजेंडे पर ही काम कर रही हैं। वैश्विक समुदाय अब पाकिस्तान की इन हरकतों को बहुत बारीकी से देख रहा है और समय-समय पर उसे कटघरे में भी खड़ा किया जाता है। भारत ने भी यह साफ कर दिया है कि वह पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव कूटनीतिक दबाव बनाए रखेगा, ताकि वहां की दबी-कुचली आवाज को पूरी दुनिया सुन सके। मंदिर के विध्वंस के बाद भले ही पाकिस्तान ने वहां मदरसा खड़ा कर दिया हो, लेकिन इतिहास के पन्नों से उस प्राचीन मंदिर की पवित्रता और वहां के स्थानीय हिंदुओं के विश्वास को कोई भी ताकत नहीं मिटा सकती है, और यह घटना पाकिस्तान के माथे पर हमेशा एक बदनुमा दाग बनकर रहेगी।