गोलियों का डर नहीं: PoK में पाकिस्तान के खिलाफ फूटा गुस्सा, शुरू हुआ गांधीवादी सत्याग्रह आंदोलन और बेबस हुए जनरल असीम मुनीर
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से इस वक्त एक बहुत बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने इस्लामाबाद की हुकूमत और वहां की खुफिया एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। वर्षों से पाकिस्तानी सेना के जुल्म, मानवाधिकार हनन और आर्थिक बदहाली का शिकार बन रहे पीओके के आम नागरिकों ने अब अपनी आवाज को बुलंद करते हुए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। क्षेत्र के लोगों ने पाकिस्तान सरकार और सेना के दमनकारी रवैये के खिलाफ महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलते हुए एक अनूठा 'गांधीवादी सत्याग्रह आंदोलन' शुरू कर दिया है। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि अब उन्हें पाकिस्तानी फौज की गोलियों और बंदूकों का कोई डर नहीं है, और वे अपनी स्वतंत्रता तथा अधिकारों के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ने को पूरी तरह तैयार हैं।
पाकिस्तानी फौज के जुल्मों के खिलाफ सड़कों पर उतरे स्थानीय लोग
पीओके के प्रमुख शहरों और कस्बों में इन दिनों हालात बेहद तनावपूर्ण लेकिन अभूतपूर्व रूप से क्रांतिकारी बने हुए हैं। पिछले कई दशकों से पाकिस्तान के कब्जे वाले इस क्षेत्र के लोगों को दोयम दर्जे का नागरिक मानकर दबाया जाता रहा है। स्थानीय संसाधनों की खुली लूट, भारी-भरकम बिजली के बिल, खाने-पीने की जरूरी चीजों की आसमान छूती कीमतें और पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों ने अब जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। पहले जो विरोध प्रदर्शन छुटपुट रूप से होते थे, अब वे एक बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुके हैं। आम जनता, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सभी सड़कों पर उतरकर खुलकर पाकिस्तान विरोधी नारे लगा रहे हैं और पाकिस्तानी हुक्मरानों को सीधी चुनौती दे रहे हैं।
हिंसा का जवाब अहिंसा से: शुरू हुआ अनूठा गांधीवादी सत्याग्रह
इस बड़े आंदोलन की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि पीओके के अवाम ने हथियारों या हिंसा का रास्ता चुनने के बजाय अहिंसा और शांतिपूर्ण प्रतिरोध का मार्ग अपनाया है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह के आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए स्थानीय नागरिकों ने बिना किसी हथियार के सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वे शांतिपूर्ण धरने दे रहे हैं, रैलियां निकाल रहे हैं और सरकारी मशीनरी का असहयोग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का यह कहना है कि पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को कुचलने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है, लेकिन इस बार जनता ने ठान लिया है कि वे गोलियों के सामने झुकेंगे नहीं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर ही दम लेंगे।
पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर और हुकूमत पूरी तरह बेबस
इस जनविद्रोह से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की मुश्किलें सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। स्थिति इतनी बेकाबू हो चुकी है कि पाकिस्तानी सेना और अर्धसैनिक बलों के पसीने छूट रहे हैं। जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व वाली पाकिस्तानी सेना हमेशा से बल प्रयोग कर आवाज दबाने की नीति पर चलती रही है, लेकिन जब जनता ने यह ऐलान कर दिया कि उन्हें गोलियों का कोई डर नहीं है, तो सेना की रणनीति पूरी तरह फेल साबित हो रही है। यदि सेना ज्यादा बड़े पैमाने पर नरसंहार या बल प्रयोग करती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की रही-सही साख भी पूरी तरह से मिट्टी में मिल जाएगी, जिससे इस्लामाबाद के हुक्मरान पूरी तरह असमंजस और बेबसी की स्थिति में हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और वैश्विक मंचों पर गूंज
पीओके के इस ऐतिहासिक गांधीवादी सत्याग्रह आंदोलन की गूंज अब धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मीडिया और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों तक पहुंच रही है। दुनिया भर के देश और मानवाधिकार कार्यकर्ता यह देख रहे हैं कि कैसे पाकिस्तान अपने ही कब्जे वाले क्षेत्र के लोगों पर अमानवीय अत्याचार कर रहा है और वहां की जनता अब पाकिस्तानी कब्जे से पूरी तरह मुक्ति चाहती है। भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विश्लेषकों का भी यह मानना है कि पाकिस्तान के आंतरिक हालात और उसकी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वह अब अपने अवैध कब्जों को ज्यादा दिनों तक संभाल कर नहीं रख पाएगा। पीओके की जनता का यह विद्रोह पाकिस्तान के विघटन की एक नई शुरुआत साबित हो सकता है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था की बदहाली और भारी रोष
इस आंदोलन के पीछे एक बड़ा कारण पीओके की चरमराई हुई अर्थव्यवस्था और विकास कार्यों की पूरी तरह से अनदेखी होना भी है। पाकिस्तान सरकार ने इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन तो भरपूर किया, लेकिन वहां के नागरिकों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास के नाम पर कुछ नहीं दिया। भारी टैक्स और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जनता अब समझ चुकी है कि पाकिस्तान के साथ रहने का मतलब केवल बर्बादी और गुलामी है। यही वजह है कि आज बच्चे से लेकर बूढ़े तक हर कोई इस सत्याग्रह में कूद पड़ा है और पाकिस्तान के खिलाफ आर-पार की हुंकार भर रहा है।