नेपाल के PM बालेन शाह का 'पावर गेम': भारत को भी दिखाई अकड़, विदेश सचिव का दौरा टला

नेपाल के PM बालेन शाह का 'पावर गेम': भारत को भी दिखाई अकड़, विदेश सचिव का दौरा टला

Up kiran, Digital Desk : काठमांडू में सत्ता की कमान संभालते ही प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी कूटनीतिक चालों से दुनिया को चौंका दिया है। नेपाल की राजनीति में 'धुरंधर' माने जाने वाले बालेन शाह ने एक ऐसा सख्त रुख अपनाया है, जिससे न केवल भारत बल्कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश भी हैरान हैं। ताजा घटनाक्रम में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री का प्रस्तावित नेपाल दौरा अनिश्चितकाल के लिए टल गया है। जानकारों का मानना है कि यह महज एक दौरा रद्द होना नहीं है, बल्कि नेपाल की बदलती विदेश नीति का एक बड़ा संकेत है।

ड्राइंग रूम डिप्लोमेसी पर ताला: क्यों नहीं मिले बालेन शाह?

नेपाल के प्रधानमंत्री ने कार्यभार संभालते ही दशकों से चली आ रही 'ड्राइंग रूम डिप्लोमेसी' को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने 'नो मीटिंग' पॉलिसी लागू की है, जिसके तहत विदेशी राजदूतों और शीर्ष अधिकारियों के साथ होने वाली 'वन-टू-वन' निजी मुलाकातों पर पाबंदी लगा दी गई है। इसी नीति का शिकार भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत सर्जियो गोर हुए हैं। विक्रम मिस्री, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से बालेन शाह को भारत आने का आधिकारिक न्योता देने वाले थे, लेकिन पीएम कार्यालय ने मुलाकात के लिए समय ही नहीं दिया।

लिपुलेख और मानसरोवर यात्रा: तल्खी की असली वजह?

भारतीय विदेश सचिव का दौरा टलने के पीछे सिर्फ 'नो मीटिंग' पॉलिसी ही नहीं, बल्कि सीमा विवाद की गहरी खाई भी नजर आ रही है। भारत और चीन द्वारा विवादित ट्राई-जंक्शन 'लिपुलेख' के रास्ते मानसरोवर यात्रा दोबारा शुरू करने के फैसले पर बालेन शाह ने सख्त आपत्ति जताई है। नेपाल इस क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है और उसने इस मुद्दे पर भारत व चीन दोनों को डिप्लोमैटिक नोट भेजकर अपना विरोध दर्ज कराया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह नेपाल के एकतरफा दावों को स्वीकार नहीं करता, जिससे दोनों देशों के बीच कूटनीतिक पारा चढ़ गया है।

अमेरिकी दूत को भी दिखाया ठेंगा, मंत्रियों की सलाह दरकिनार

बालेन शाह की इस जिद का असर केवल भारत पर ही नहीं पड़ा। दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी दूत सर्जियो गोर भी नेपाल में पीएम से मिलने के लिए कतार में खड़े रह गए, जबकि वे भूटान और श्रीलंका के शीर्ष नेतृत्व से मिलकर आए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल के कैबिनेट मंत्रियों स्वर्णिम वाग्ले और सिसिर खनाल ने प्रधानमंत्री को इस कठोर रुख पर पुनर्विचार करने की सलाह दी थी, लेकिन बालेन शाह ने अपने मंत्रियों की बात को भी तवज्जो नहीं दी। उन्होंने साफ कर दिया है कि अगले एक साल तक वे किसी भी विदेश दौरे पर नहीं जाएंगे।

राष्ट्रवाद या रणनीतिक चूक: किसका होगा घाटा?

बालेन शाह के इस कदम को नेपाल में 'राष्ट्रीय हित' के रक्षक के तौर पर देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने विदेशी हस्तक्षेप को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया है। हालांकि, कूटनीतिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े खिलाड़ियों के बीच संतुलन बनाना नेपाल की मजबूरी है। अगर नेपाल अपने सबसे करीबी पड़ोसी भारत को नजरअंदाज करता है, तो उसे भविष्य में रणनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिलहाल, नजरें 1 जून को होने वाले 'इंटरनेशनल बिग कैट एलायंस' पर टिकी हैं, जिसमें नेपाल के विदेश मंत्री के शामिल होने की उम्मीद है।

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