होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की नई 'जिद': 60 दिन के सीजफायर के बीच बढ़ रहा तनाव, क्या फिर भड़केगी पश्चिम एशिया की आग

होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान की नई 'जिद': 60 दिन के सीजफायर के बीच बढ़ रहा तनाव, क्या फिर भड़केगी पश्चिम एशिया की आग

पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों के बीच होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा हो गया है। हाल ही में हुए 60 दिन के सीजफायर और 14 सूत्रीय अंतरिम समझौते के बावजूद ईरान ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अपने नियंत्रण के अधिकार को फिर से दोहराया है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी फैसले में उसकी भूमिका को नजरअंदाज करना असुरक्षा का कारण बनेगा। ओमान के समीप एक जहाज पर हुए हमले ने इस तनाव को और हवा दे दी है, जिससे अमेरिका और छह खाड़ी देश सीधे तौर पर ईरान के सामने आ गए हैं।

अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ती खींचतान अमेरिका और खाड़ी देशों के गठबंधन ने ईरान के टोल वसूली और नियंत्रण वाले दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने इसे लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि होर्मुज से गुजरने वाली जहाजों की सुरक्षित आवाजाही तब तक सुनिश्चित नहीं हो सकती, जब तक ईरान को एक तटीय देश के रूप में उचित स्थान न मिले। वहीं, ईरान का आरोप है कि खाड़ी में अमेरिकी सेना की मौजूदगी ही क्षेत्रीय अस्थिरता की असली जड़ है। इस बीच, दुबई में गलती से जारी हुआ मिसाइल अलर्ट भी पूरे क्षेत्र में बढ़े हुए डर और अनिश्चितता को दर्शाता है।

परमाणु निरीक्षण और वैश्विक चिंता तनाव के इन संकेतों के बीच, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रासी ने कहा है कि ईरान ने उन्हें अपने परमाणु स्थलों के निरीक्षण की अनुमति दे दी है, जो एक सकारात्मक कदम है। हालांकि, ईरान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि 'अंतिम समझौते' तक देश के मुख्य परमाणु स्थलों को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाएगा और वहां किसी बाहरी व्यक्ति की पहुंच नहीं होगी। इन सब घटनाक्रमों का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जिनमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।

क्या आगे होगा सैन्य टकराव? अमेरिका और ईरान के बीच 18 जून को हुए 14 सूत्रीय अंतरिम समझौते के तहत एक 'संचार लाइन' की स्थापना की गई थी ताकि किसी भी सैन्य टकराव को टाला जा सके। लेकिन ईरान की ताजा जिद और होर्मुज पर उसके रुख से यह स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया का भविष्य अभी भी बेहद नाजुक मोड़ पर है। जहां एक ओर राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि ईरान आर्थिक संकट से जूझ रहा है, वहीं तेहरान अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहा है।

 

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