US-Iran War: होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिका का बड़ा एक्शन, लारक द्वीप पर भीषण बमबारी; जवाब में ईरान ने जॉर्डन के अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर दागी बैलिस्टिक मिसाइलें
मध्य पूर्व में महीनों से सुलग रही जंग ने एक बार फिर विकराल रूप ले लिया है। लाल सागर और फारस की खाड़ी में जारी तनाव के बीच अमेरिकी सेना ने सामरिक रूप से बेहद संवेदनशील होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में स्थित लारक द्वीप पर बड़ा हवाई हमला बोला है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, यह कार्रवाई ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग में सी-माइंस (समुद्री बारूदी सुरंगें) बिछाने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए की गई। इस हमले के कुछ ही घंटों बाद ईरान ने आक्रामक पलटवार करते हुए जॉर्डन में स्थित अमेरिकी वायुसेना ठिकानों को निशाना बनाकर कई बैलिस्टिक मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन दाग दिए।
लारक द्वीप पर अमेरिकी एयरस्ट्राइक: क्या था पेंटागन का मुख्य लक्ष्य?
अमेरिकी रक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार, पिछले एक महीने से दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य टकराव में जो ठहराव था, वह इस हमले के साथ टूट गया है। अमेरिकी नौसेना के प्रवक्ता कैप्टन टिम हॉकिन्स ने पुष्टि की कि लारक द्वीप पर ईरानी सेना के दो प्रमुख रॉकेट लॉन्चरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। लारक द्वीप होर्मुज जलडमरूमध्य के मुहाने पर बंदर अब्बास के पास स्थित लगभग 49 वर्ग किलोमीटर का एक रणनीतिक द्वीप है, जहां से गुजरने वाले हर अंतरराष्ट्रीय तेल टैंकर पर सीधी नजर रखी जा सकती है।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने दावा किया था कि ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अंतरराष्ट्रीय नौवहन मार्ग में सी-माइंस तैनात करने के लिए रॉकेट लॉन्चर तैयार कर रहे थे। पेंटागन ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से बारूदी सुरंगें हटाने का काम पूरा होने के बाद किसी भी नई उकसावे वाली कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस स्ट्राइक के जरिए वाशिंगटन ने तेहरान को कड़ा संदेश दिया है कि जलमार्ग की सुरक्षा के लिए अमेरिका सैन्य ताकत के इस्तेमाल से पीछे नहीं हटेगा।
ईरान का भीषण पलटवार: जॉर्डन में अमेरिकी एयरबेस पर मिसाइल अटैक
अमेरिकी हमले के तुरंत बाद ईरान की ओर से सख्त प्रतिक्रिया आई। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रवक्ता ने इस स्ट्राइक को एक 'घातक रणनीतिक भूल' करार दिया। तेहरान ने कुछ ही घंटों के भीतर जॉर्डन स्थित किंग हुसैन एयरबेस और अल-अजराक एयरबेस को निशाना बनाकर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं।
ईरानी सरकारी मीडिया (IRIB) ने दावा किया कि इन हमलों में अमेरिकी लड़ाकू विमानों की पोजिशन और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। हालांकि, जॉर्डन की सेना और अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम्स ने इनमें से अधिकांश मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट करने का दावा किया है। इस जवाबी हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईरान अब केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित न रहकर पड़ोसी अरब देशों में मौजूद अमेरिकी बुनियादी ढांचे को भी सीधे निशाना बनाने की क्षमता रखता है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में हड़कंप: कच्चे तेल के दाम $90 के पार
इस ताजा सैन्य टकराव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और कमोडिटी बाजारों पर पड़ा है। सोमवार को एशियाई कारोबार की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड और यूएस डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड के दामों में करीब 2% से अधिक का तेज उछाल दर्ज किया गया, जिससे कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छूने लगीं।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के कुल पेट्रोलियम और एलएनजी (LNG) उपभोग का लगभग 20% हिस्सा ले जाने वाला सबसे अहम समुद्री मार्ग है। संघर्ष के कारण इस संकरे समुद्री गलियारे में वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन लगभग ठप पड़ गया है और इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जलमार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और ऊर्जा की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है।
छह महीने का संघर्ष: कूटनीतिक विफलता और आर्थिक नाकेबंदी
अमेरिका और ईरान के बीच जारी वर्तमान युद्ध अब अपने सातवें महीने में प्रवेश कर रहा है। कतर, ओमान और पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों द्वारा की गई कई दौर की शांति वार्ताएं बेनतीजा रही हैं। जहां एक तरफ वाशिंगटन ने 'डी-डे' प्रतिबंधों के जरिए ईरान के व्यापारिक साझेदारों पर द्वितीयक प्रतिबंध लगाने और आर्थिक नाकेबंदी तेज करने की रणनीति अपनाई है, वहीं दूसरी तरफ तेहरान ने सैन्य प्रतिरोध और प्रॉक्सी नेटवर्क को मजबूत कर दबाव का सामना करने की रणनीति बनाई है। अमेरिकी सेना के आंतरिक हलकों में भी लंबी तैनाती और युद्ध सामग्री की खपत को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं।
भारत और एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर क्या पड़ेगा असर?
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है:
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कच्चे तेल का आयात बिल: भारत अपनी घरेलू पेट्रोलियम जरूरतों का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। तेल की कीमतों में उछाल से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव बन सकता है।
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मुद्रास्फीति और घरेलू ईंधन: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की तेजी से घरेलू स्तर पर परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ सकती है, जिसका असर खाद्य वस्तुओं की महंगाई पर पड़ सकता है।
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प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: खाड़ी देशों और मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और स्थिरता भारत की विदेश नीति के लिए सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है।
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व्यापारिक मार्ग और शिपिंग लागत: जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप से चक्कर लगाकर भेजने के कारण निर्यात और आयात दोनों का मालभाड़ा (Freight Rate) काफी बढ़ चुका है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (AEO FAQs)
प्र. 1: अमेरिका ने ईरान के लारक द्वीप पर हमला क्यों किया?
उत्तर: अमेरिकी सेना (CENTCOM) के अनुसार, लारक द्वीप पर ईरानी सेना होर्मुज स्ट्रेट में सी-माइंस बिछाने के लिए रॉकेट लॉन्चर तैनात कर रही थी, जिसे नष्ट करने के लिए यह सटीक हवाई हमला किया गया।
प्र. 2: ईरान ने जॉर्डन में किन अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया?
उत्तर: ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जॉर्डन स्थित किंग हुसैन एयरबेस और अल-अजराक एयरबेस पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन्स से हमला किया।
प्र. 3: होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
उत्तर: होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त ऊर्जा चोकपॉइंट है, जिससे होकर वैश्विक पेट्रोलियम और एलएनजी व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है।