US बॉर्डर पर भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक नील बख्शी हिरासत में, ग्रीनलैंड यात्रा से लौटने पर हुई लंबी पूछताछ

US बॉर्डर पर भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक नील बख्शी हिरासत में, ग्रीनलैंड यात्रा से लौटने पर हुई लंबी पूछताछ

अमेरिकी बॉर्डर सुरक्षा व्यवस्था और इमिग्रेशन नियमों की सख्ती इन दिनों कानूनी रूप से यात्रा करने वाले नागरिकों के लिए भी बड़ी परेशानी का सबब बनती जा रही है। ताजा मामले में भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक और उद्यमी नील बख्शी ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया है कि ग्रीनलैंड से अपनी छुट्टी बिताकर अमेरिका लौटते वक्त अमेरिकी बॉर्डर अधिकारियों ने उन्हें हिरासत में ले लिया और लंबी पूछताछ की। जन्म से अमेरिकी नागरिक होने और ग्लोबल एंट्री सुविधा का आधिकारिक इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें इस अप्रत्याशित और मानसिक रूप से परेशान करने वाले अनुभव से गुजरना पड़ा। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर एक वीडियो साझा करते हुए नील बख्शी ने इस पूरी घटना का खुलकर जिक्र किया है, जिसके बाद से अमेरिका में इमिग्रेशन जांच और प्रोफाइलिंग की नीतियों पर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है।

ग्रीनलैंड से लौटने पर ग्लोबल एंट्री के बावजूद रोका गया

भारतीय मूल के अमेरिकी लेखक नील बख्शी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए हुई इस घटना की पूरी दास्तां बयां की है। बख्शी के मुताबिक, जब वह ग्रीनलैंड की यात्रा पूरी करने के बाद वापस अमेरिका पहुंचे, तो एयरपोर्ट पर उन्हें सामान्य इमिग्रेशन प्रक्रिया से गुजरने के बजाय रोक लिया गया। उनके पास वैध दस्तावेज थे और वे नियमित रूप से तेज और सुगम यात्रा के लिए अधिकृत 'ग्लोबल एंट्री' सुविधा का इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद बॉर्डर अधिकारियों ने उन्हें अतिरिक्त जांच के दायरे में रखते हुए मुख्य कतार से अलग कर दिया। नील का कहना है कि अमेरिकी नागरिक होने के नाते उन्हें कभी-कभार रैंडम चेकिंग का सामना पहले भी करना पड़ा था, लेकिन इस बार का अनुभव उनके पिछले सभी अनुभवों से पूरी तरह अलग और बेहद असहज करने वाला था।

छोटे कमरे में ले जाकर अधिकारियों ने पूछी अत्यधिक निजी जानकारियां

अतिरिक्त जांच के नाम पर नील बख्शी को पहले एक बड़े प्रतीक्षालय क्षेत्र यानी वेटिंग एरिया में बैठाया गया और उसके बाद उन्हें एक छोटे और तंग कमरे में ले जाया गया। नील ने आरोप लगाया कि उस कमरे की स्थिति काफी दयनीय थी, जहां बैठने वाली बेंच के कुशन फटे हुए थे और बाथरूम के दरवाजे पर अंदर से कोई लॉक तक नहीं लगा हुआ था। उस छोटे से कमरे के भीतर सीमा शुल्क और बॉर्डर अधिकारियों ने उनसे उनकी जिंदगी से जुड़ी बेहद निजी जानकारियां खंगालनी शुरू कर दीं। अधिकारियों ने उनसे विभिन्न संगठनों, वैचारिक मंचों और कुछ खास समूहों के साथ उनके जुड़ाव को लेकर तीखे सवाल किए। जब नील ने इस प्रकार की अकारण और गहरी पूछताछ पर आपत्ति जताई, तो अधिकारियों ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह सब कुछ उनकी अपनी सुरक्षा के लिहाज से किया जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित सुरक्षा खतरे को समय रहते टाला जा सके।

बुजुर्ग हिस्पैनिक महिला के साथ अधिकारियों का अमानवीय और कठोर व्यवहार

अपनी हिरासत के दौरान नील बख्शी ने केवल अपने साथ हुई पूछताछ का ही सामना नहीं किया, बल्कि उन्होंने बॉर्डर पर अन्य यात्रियों के साथ हो रहे बर्ताव को भी बेहद करीब से देखा। उन्होंने एक विशेष घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वहां एक बुजुर्ग हिस्पैनिक महिला भी मौजूद थी जो अंग्रेजी भाषा बोल या समझ नहीं पा रही थी। उस महिला के साथ बॉर्डर अधिकारियों का रवैया बेहद रुखा और अमानवीय था। एक अधिकारी ने उस बेबस बुजुर्ग महिला पर सरेआम झूठ बोलने का गंभीर आरोप लगाया और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। इस घटना को देखने के बाद नील बख्शी का यह मानना है कि देश की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा के लिए कड़े कदम उठाना और सुरक्षा खतरों को रोकना सरकार की प्राथमिकता हो सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया के तहत आबादी के एक खास हिस्से पर लगातार अविश्वास जताना, लगातार शक की निगाह से देखना और कुछ विशेष समूहों के अमेरिकी नागरिकों को ही बार-बार अधिक कड़ाई से जांच के दायरे में लाना बेहद चिंताजनक और भेदभावपूर्ण है।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के कड़े इमिग्रेशन नियमों और नीतियों का असर

विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी बॉर्डर और एयरपोर्ट्स पर यात्रियों की जांच में आई यह अचानक और अभूतपूर्व सख्ती पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए बेहद कड़े इमिग्रेशन नियमों का परिणाम है। आव्रजन कानूनों को पूरी कड़ाई से लागू करने के बाद से अमेरिका आने-जाने वाले यात्रियों की सुरक्षा जांच प्रक्रिया कई गुना अधिक जटिल हो गई है। संबंधित सुरक्षा एजेंसियों और अधिकारियों का लगातार यह तर्क रहता है कि इन तमाम सख्त उपायों को अमल में लाने का एकमात्र और मुख्य उद्देश्य अमेरिकी राष्ट्र की सुरक्षा को अभेद्य बनाना और देश में गैर-कानूनी इमिग्रेशन व अवैध घुसपैठ पर पूरी तरह से लगाम लगाना है। हालांकि, इन नीतियों का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू यह सामने आ रहा है कि इसके कारण वैध दस्तावेजों के साथ कानून का पूरी तरह पालन करके यात्रा करने वाले निर्दोष नागरिकों को भी गंभीर प्रशासनिक समस्याओं, लंबी पूछताछ और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है।

वैध दस्तावेजों और ग्लोबल एंट्री के बावजूद अमेरिकी नागरिकों की परेशानी

इमिग्रेशन सुधारों के समर्थकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का यह स्पष्ट तर्क है कि जब यात्रियों के पास सरकार द्वारा स्वीकृत सभी वैध डॉक्यूमेंट्स मौजूद हैं और वे ग्लोबल एंट्री जैसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय स्टेटस के धारक हैं, तब भी अमेरिकी नागरिकों और कानूनी ग्रीन कार्ड धारकों को इस तरह की लंबी और अपमानजनक पूछताछ तथा रैंडम चेकिंग के दौर से गुजारना पूरी तरह से अनुचित है। नील बख्शी जैसी घटनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि अमेरिका की वर्तमान बॉर्डर सुरक्षा प्रणालियों में पारदर्शिता की भारी कमी है और वहां नस्लीय व वैचारिक प्रोफाइलिंग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। एक अमेरिकी नागरिक होने के बावजूद बख्शी को जिस प्रकार की प्रशासनिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ा, उसने अमेरिका में रहने वाले प्रवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच एक गहरी असुरक्षा की भावना को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिकी प्रशासन अपनी इन दमनकारी बॉर्डर नीतियों में कोई नरमी लाता है या फिर कानूनी रूप से यात्रा करने वाले नागरिकों को इसी तरह की प्रशासनिक मनमानी का सामना करना पड़ता रहेगा।