Iran News: टूटी कोहनी, जहन्नुम बनी जिंदगी; रहीमी सिस्टर्स में एक को फांसी, दूसरी को 25 साल जेल, जानें खौफनाक दास्तां

Iran News: टूटी कोहनी, जहन्नुम बनी जिंदगी; रहीमी सिस्टर्स में एक को फांसी, दूसरी को 25 साल जेल, जानें खौफनाक दास्तां

ईरान में महिलाओं के अधिकारों और सरकार की नीतियों के खिलाफ उठने वाली आवाजों को कुचलने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालिया मामले में दो सगी बहनों, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार हलकों में 'रहीमी सिस्टर्स' के रूप में जाना जा रहा है, के खिलाफ तेहरान की रिवोल्यूशनरी कोर्ट ने रूह कंपा देने वाला फैसला सुनाया है। शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने और मानवाधिकारों की मांग करने वाली इन दोनों बहनों में से एक को मृत्युदंड यानी फांसी की सजा दी गई है, जबकि दूसरी बहन को पच्चीस साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।

मानवाधिकार संगठनों द्वारा जारी की गई रिपोर्टों के अनुसार, इन दोनों बहनों को गिरफ्तारी के बाद से ही अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। हिरासत के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा की गई हिंसक पूछताछ में एक बहन की कोहनी की हड्डी टूट गई, लेकिन लंबे समय तक उसे किसी भी प्रकार की बुनियादी चिकित्सीय सुविधा मुहैया नहीं कराई गई। जेल की तंग और अंधेरी कोठरियों में उन्हें न केवल मानसिक बल्कि असहनीय शारीरिक उत्पीड़न से गुजरना पड़ा है, जिसने उनकी जिंदगी को जीते-जी नर्क बना दिया है।

आरोपों का फर्जी जाल और निष्पक्ष सुनवाई का अभाव: मानवाधिकार संगठनों ने खड़े किए सवाल

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी समूहों और कानूनी विशेषज्ञों ने ईरानी न्यायपालिका की इस सख्त और एकतरफा कार्रवाई पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। रहीमी सिस्टर्स पर 'ईश्वर के खिलाफ युद्ध छेड़ने' (मोहरेबेह), राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने और शासन विरोधी दुष्प्रचार फैलाने जैसे गंभीर और गैर-जमानती आरोप थोपे गए हैं। ईरान में ऐसे आरोपों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोधियों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं की आवाज दबाने के लिए किया जाता रहा है।

अदालती सुनवाई के दौरान दोनों बहनों को अपनी पसंद का कानूनी प्रतिनिधि यानी वकील चुनने की अनुमति तक नहीं दी गई। बंद कमरों में चली संक्षिप्त सुनवाई के बाद यह क्रूर फैसला सुना दिया गया। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह पूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह से पूर्वाग्रह से ग्रस्त थी और इसका मकसद केवल जनता के बीच डर का माहौल पैदा करना है ताकि भविष्य में कोई भी नागरिक शासन की निरंकुश नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरने की हिम्मत न जुटा सके।

हिजाब विरोधी लहर और 'महिला, जीवन, स्वतंत्रता' आंदोलन से जुड़े तार

ईरान में बीते कुछ वर्षों से हिजाब कानूनों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर जनाक्रोश उफान पर रहा है। महसा अमिनी की हिरासत में हुई मौत के बाद शुरू हुए 'महिला, जीवन, स्वतंत्रता' (Woman, Life, Freedom) आंदोलन ने देश के कोने-कोने में महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े होने का साहस दिया था। रहीमी बहनें भी इसी सामाजिक और राजनीतिक चेतना का हिस्सा बनी थीं, जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी थी।

ईरानी शासन ने इन प्रदर्शनों को शुरू से ही पश्चिमी ताकतों द्वारा प्रायोजित 'दंगे' करार दिया और इन्हें दबाने के लिए बड़े पैमाने पर बल प्रयोग किया। हजारों प्रदर्शनकारियों को जेलों में ठूंस दिया गया, दर्जनों को फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका है और सैकड़ों लोग सुरक्षा बलों की गोलियों और लाठियों का शिकार हुए हैं। रहीमी सिस्टर्स का मामला इसी दमनकारी तंत्र की एक और दर्दनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली मिसाल बन गया है।

जेलों में अमानवीय हालात: चिकित्सा सहायता से वंचित कैदी

ईरान की कुख्यात जेलों, जैसे एविन जेल, में राजनीतिक कैदियों की स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है। रहीमी सिस्टर्स के परिजनों से छनकर आ रही जानकारियों के अनुसार, टूटी कोहनी और गंभीर चोटों से कराह रही बहन को दर्द निवारक दवाइयां तक नहीं दी गईं। जेल प्रशासन द्वारा चिकित्सकीय उपेक्षा का उपयोग कैदियों के आत्मबल को तोड़ने और उनसे जबरन जुर्म कबूल करवाने के एक हथियार के रूप में किया जाता है।

परिजनों को हफ्तों तक उनसे मिलने की इजाजत नहीं दी गई और न ही उनके स्वास्थ्य की कोई आधिकारिक जानकारी साझा की गई। कैदियों को एकांत कारावास में रखना, नींद से वंचित करना और लगातार मानसिक प्रताड़ना देना ईरानी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार एजेंसियों को इन जेलों का स्वतंत्र दौरा करने की अनुमति नहीं दी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आक्रोश: वैश्विक प्रतिबंधों और कड़े कदमों की मांग

रहीमी सिस्टर्स को सुनाई गई इस सख्त और अमानवीय सजा के सामने आने के बाद दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के निकायों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य वैश्विक संस्थाओं ने तेहरान प्रशासन से इस फैसले को तुरंत रद्द करने और दोनों बहनों को बिना शर्त रिहा करने की अपील की है।

वैश्विक नेताओं से आग्रह किया जा रहा है कि वे ईरान के खिलाफ केवल बयानों तक सीमित न रहें, बल्कि मानवाधिकारों के घोर हनन के जिम्मेदार ईरानी न्यायाधीशों और सुरक्षा अधिकारियों पर कड़े लक्षित प्रतिबंध लगाएं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद ईरानी हुकूमत अपने रुख पर अडिग दिखाई दे रही है, जिससे रहीमी बहनों के जीवन और भविष्य पर गहरा संकट मंडरा रहा है। यह मामला दुनिया को यह याद दिलाने के लिए काफी है कि एक निरंकुश व्यवस्था में बुनियादी मानवाधिकारों की मांग करने की क्या कीमत चुकानी पड़ती है।