पाकिस्तान में पलटा इतिहास: लाहौर की सड़कों को फिर मिलेंगे कृष्ण नगर और लक्ष्मी चौक जैसे हिंदू नाम
पड़ोसी देश पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से एक बेहद ऐतिहासिक और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। लाहौर की खोई हुई सांस्कृतिक विरासत और विभाजन-पूर्व की ऐतिहासिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए पंजाब की मरियम नवाज सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने लाहौर की उन दर्जनों ऐतिहासिक सड़कों, चौकों और गलियों के आजादी से पहले के (मूल) नामों को दोबारा बहाल करने की योजना को आधिकारिक मंजूरी दे दी है, जिन्हें पिछले कुछ दशकों में बदल दिया गया था।
एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने सोमवार को इस बात की पुष्टि की है कि बीते कुछ दशकों में राजनीतिक और धार्मिक तुष्टिकरण के तहत लाहौर के कई ब्रिटिशकालीन और हिंदू धर्म व संस्कृति से जुड़े ऐतिहासिक नामों को मिटाकर इस्लामी, पाकिस्तानी या स्थानीय हस्तियों के नाम पर रख दिया गया था, जिन्हें अब सरकार बदलने जा रही है।
मुख्यमंत्री मरियम नवाज की कैबिनेट बैठक में मिली हरी झंडी
पंजाब सरकार के एक उच्चाधिकारी ने समाचार एजेंसी पीटीआई-भाषा (PTI) को बताया, “कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री मरियम नवाज की अध्यक्षता में हुई पंजाब कैबिनेट की एक विशेष बैठक में इस प्रस्ताव पर गहन चर्चा हुई। कैबिनेट ने लाहौर और उसके आसपास के इलाकों की विभिन्न सड़कों, बाज़ारों और गलियों के मूल, ऐतिहासिक और विभाजन-पूर्व के नामों को कानूनी रूप से बहाल करने की महत्वाकांक्षी योजना को अपनी मंजूरी दे दी है।” अधिकारी के मुताबिक, इस फैसले का एकमात्र उद्देश्य इस ऐतिहासिक शहर की वास्तविक बहुसांस्कृतिक पहचान और समृद्ध विरासत को वैश्विक पटल पर फिर से स्थापित करना है।
पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ कर रहे हैं इस 'महा-परियोजना' की अगुवाई
इस पूरी अनोखी पहल के पीछे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पीएमएल-एन (PML-N) के सर्वोच्च नेता नवाज शरीफ का दिमाग माना जा रहा है। अधिकारियों ने बताया कि नवाज शरीफ खुद इस समय 'लाहौर विरासत क्षेत्र पुनरुद्धार परियोजना' (Lahore Heritage Area Revitalization Project) के प्रमुख के रूप में इस पूरे मिशन की कमान संभाल रहे हैं। उन्होंने ही शहर के पुराने स्वरूप को वापस लाने के लिए यह खाका तैयार किया था, जिसके प्रस्ताव को पिछले सप्ताह मरियम कैबिनेट ने बिना किसी विरोध के पास कर दिया।
इन प्रसिद्ध हिंदू और ब्रिटिशकालीन नामों को मिटाकर बदला गया था स्वरूप
विभाजन के बाद और खासकर पिछले कुछ सालों में लाहौर के जिन ऐतिहासिक स्थानों, सड़कों और चौकों के नाम पिछली कट्टरपंथी या स्थानीय सरकारों ने बदल दिए थे, उनकी सूची काफी लंबी है। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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ब्रिटिशकालीन नाम: क्वींस रोड, जेल रोड, डेविस रोड, लॉरेंस रोड, एम्प्रेस रोड और आउटफॉल रोड।
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हिंदू और ऐतिहासिक नाम: कृष्ण नगर, संत नगर, धरमपुरा, ब्रैंडरेथ रोड, राम गली, टेम्पबेल स्ट्रीट, लक्ष्मी चौक, जैन मंदिर रोड, कुम्हारपुरा, मोहन लाल बाजार, सुंदर दास रोड, भगवान पुरा और शांति नगर।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नई पुनरुद्धार योजना के तहत अब 'इस्लामपुरा' का नाम बदलकर फिर से उसका मूल नाम 'कृष्ण नगर' किया जाएगा। इसी तरह, वर्तमान 'बाबरी मस्जिद चौक' का नाम बदलकर दोबारा 'जैन मंदिर चौक' और 'मुस्तफाबाद' को फिर से उसका पुराना नाम 'धर्मपुरा' दिया जाएगा।
भाई शहबाज शरीफ की 'पुरानी गलती' को सुधारने का दांव!
नवाज शरीफ ने न केवल सड़कों के नाम बदलने बल्कि मिंटो पार्क (जिसे अब ग्रेटर इकबाल पार्क कहा जाता है) में स्थित तीन ऐतिहासिक क्रिकेट मैदानों और एक पारंपरिक 'अखाड़ा' (कुश्ती रिंग) के जीर्णोद्धार का भी बड़ा प्रस्ताव रखा है। राजनीतिक विश्लेषक नवाज शरीफ के इस कदम को उनके छोटे भाई और मौजूदा प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा अतीत में किए गए नुकसान की भरपाई (डैमेज कंट्रोल) की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
दरअसल, साल 2015 में जब शहबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने एक अंधाधुंध शहरी विकास कार्यक्रम के तहत लाहौर की खेल संस्कृति के प्रतीक रहे इन तीन ऐतिहासिक क्रिकेट मैदानों, क्रिकेट क्लबों के क्षेत्रों और एक बेहद मशहूर पारंपरिक कुश्ती अखाड़े को बुलडोजर चलाकर पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। उस वक्त शहबाज सरकार को खेल प्रेमियों और इतिहासकारों की तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा था।
लाला अमरनाथ से लेकर गामा पहलवान तक: क्यों बेहद ऐतिहासिक है मिंटो पार्क?
लाहौर का मिंटो पार्क खेल जगत और उपमहाद्वीप के इतिहास में एक बेहद पवित्र और ऐतिहासिक स्थान माना जाता है। पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व महान कप्तान इंजमाम-उल-हक समेत दर्जनों विश्व प्रसिद्ध क्रिकेटरों ने इसी मिंटो पार्क के मैदानों और क्रिकेट क्लबों की धूल फांककर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपना लोहा मनवाया था।
इतना ही नहीं, भारत के विभाजन से पहले देश के दिग्गज और महानतम क्रिकेटर लाला अमरनाथ भी इसी मैदान पर नियमित रूप से ट्रेनिंग लेने और खेलने आया करते थे। इतिहास गवाह है कि जब साल 1978 में लाला अमरनाथ भारतीय क्रिकेट टीम के आधिकारिक दौरे के साथ लाहौर गए थे, तो वह पुरानी यादें ताजा करने सीधे मिंटो पार्क पहुंचे थे। वहां उन्होंने 'क्रिसेंट क्रिकेट क्लब' के युवा खिलाड़ियों के साथ लंबा वक्त बिताया था, क्योंकि देश के विभाजन की त्रासदी तक अमरनाथ इसी क्लब की तरफ से खेला करते थे।
क्रिकेट के अलावा, मिंटो पार्क का वह अखाड़ा भी इतिहास का गवाह रहा है जिसे शहबाज सरकार ने तोड़ दिया था। इस अखाड़े की मिट्टी में कभी 'रुस्तम-ए-जमां' गामा पहलवान, गूंगा पहलवान और इमाम बख्श जैसे उपमहाद्वीप के उन दिग्गज पहलवानों के मुकाबले होते थे जिनका नाम सुनकर दुनिया के बड़े-बड़े पहलवान कांपते थे। इसके साथ ही, विभाजन से पहले लाहौर में रहने वाले हिंदू और सिख समुदाय के लोग इसी ऐतिहासिक मिंटो पार्क के विशाल मैदान में हर साल पूरी भव्यता के साथ दशहरा का त्योहार मनाते थे।