SIR-CEC विवाद: 'नेहरू की गलती का खामियाजा आज देश भुगत रहा', फारूक अब्दुल्ला का बड़ा दावा; मोदी सरकार पर भी बरसे
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने देश में मतदाता सूची संशोधन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की निष्पक्षता को लेकर चल रहे विवाद के बीच एक बड़ा राजनीतिक बयान देकर सियासी माहौल गरमा दिया है। श्रीनगर में आयोजित 'हल्ला बोल' सम्मेलन को संबोधित करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए। अब्दुल्ला ने दावा किया कि आजादी के बाद नेहरू प्रशासन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल यह थी कि उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को पूरी तरह स्वतंत्र और स्वायत्त (Autonomous) संवैधानिक संस्था के रूप में स्थापित नहीं किया। उन्होंने कहा कि यदि उस समय चुनाव आयोग को कार्यपालिका के हर प्रकार के प्रभाव से मुक्त रखकर एक संपूर्ण स्वायत्त ढांचा प्रदान किया गया होता, तो आज देश में लोकतंत्र और चुनावी संस्थाओं की यह बदहाल स्थिति देखने को नहीं मिलती। फारूक अब्दुल्ला का यह बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी गठबंधन और कई नागरिक संगठन मतदाता सूचियों से कथित तौर पर लाखों वोटरों के नाम हटाए जाने को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ दिल्ली से लेकर मुंबई तक विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
'नेहरू ने स्वतंत्र नहीं बनाया, आज हम सब उसका नतीजा भुगत रहे हैं'
फारूक अब्दुल्ला ने अपने भाषण में अतीत और वर्तमान के राजनीतिक घटनाक्रमों को जोड़ते हुए कहा कि जब संविधान बन रहा था और देश लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रख रहा था, तभी चुनाव आयोग के पंखों को पूरी तरह खुला छोड़ देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि आज पूरा देश पंडित नेहरू द्वारा छोड़ी गई उसी संस्थागत कमी और गलती का खामियाजा भुगत रहा है। अब्दुल्ला ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र होता, तो सरकारों का उस पर किसी प्रकार का अंकुश या परोक्ष नियंत्रण संभव नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संस्थाओं का निष्पक्ष होना सबसे पहली शर्त है, लेकिन दुर्भाग्य से भारत में निर्वाचन आयोग कभी भी उस स्तर की स्वायत्तता हासिल नहीं कर सका, जैसी न्यायपालिका या अन्य स्वतंत्र निकायों को मिलनी चाहिए थी। उनके इस बयान ने कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के पारंपरिक गठबंधन समीकरणों के बीच भी नई राजनीतिक चर्चा छेड़ दी है, क्योंकि आम तौर पर विपक्ष नेहरूवादी लोकतांत्रिक विरासत का बचाव करता रहा है, लेकिन अब्दुल्ला ने सीधे नेहरू के संस्थागत फैसलों को वर्तमान संकट की जड़ बता दिया।
मोदी सरकार की चुनाव आयुक्त चयन प्रक्रिया पर तीखा प्रहार
नेहरू के फैसलों पर टिप्पणी करने के साथ ही नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद द्वारा बनाए गए नए कानून को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत चयन समिति में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को शामिल किया गया था, लेकिन मोदी सरकार ने नया कानून बनाकर सीजेआई को इस समिति से बाहर कर दिया और समिति के स्वरूप को 'दो बनाम एक' (सरकार के दो प्रतिनिधि और विपक्ष का एक नेता) में बदल दिया। अब्दुल्ला ने आरोप लगाया कि जब समिति में बहुमत पहले से ही सत्तापक्ष के पास रहेगा, तो विपक्ष के नेता की असहमति का कोई मतलब नहीं रह जाता। उन्होंने दावा किया कि इसी बहुमतीय चयन व्यवस्था के जरिए मनपसंद नौकरशाहों को चुनाव आयोग के शीर्ष पदों पर बैठाया जा रहा है, जिससे आयोग की निष्पक्षता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है और वह केवल सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए काम कर रहा है।
वोटर लिस्ट से नाम काटने का गंभीर आरोप: 'मुसलमानों और कपिल सिब्बल तक को नहीं बख्शा'
अब्दुल्ला ने अपने संबोधन में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और वोटर लिस्ट अपडेशन प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि देश भर में बड़े पैमाने पर नागरिकों के मताधिकार पर डाका डाला गया है। अब्दुल्ला ने कहा कि भारत का संविधान बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की देन है, जो देश के हर वयस्क नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदान का सर्वोच्च अधिकार देता है। किसी भी अधिकारी या आयोग को यह कानूनी अधिकार नहीं है कि वह मनमाने ढंग से नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटा दे। उन्होंने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के मतदाताओं के नाम चुन-चुनकर वोटर लिस्ट से विलोपित किए गए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि धांधली का स्तर इस कदर पहुंच गया कि देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल तक का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया। अब्दुल्ला ने कहा कि जब विपक्ष या मीडिया ने इन गड़बड़ियों को उजागर किया, तो आयोग ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए कह दिया कि अगले चुनावों में इसे देखा जाएगा।
'जिंदा रहूं या न रहूं, देश में बदलाव की हवा चल पड़ी है'
चुनावी मशीनरी और केंद्र सरकार की नीतियों पर जमकर बरसने के बाद फारूक अब्दुल्ला ने देश की जनता के प्रतिरोध को लोकतंत्र की सबसे बड़ी उम्मीद बताया। उन्होंने कहा कि चाहे सत्ता में बैठे लोग कितना भी दमन कर लें, लेकिन भारत की आत्मा अभी मरी नहीं है, भारत आज भी जिंदा है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की हार्दिक खुशी है कि अब राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और आम अवाम इस अन्याय के खिलाफ खुलकर सड़कों पर उतरने लगे हैं। मुंबई में हुए हालिया विशाल प्रदर्शनों और दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए घेराव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जनता ने अब डरना छोड़ दिया है और अपना साहस दिखाना शुरू कर दिया है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा, 'मैं चाहे आने वाले समय में जिंदा रहूं या न रहूं, लेकिन देश में बदलाव की वह आंधी चल चुकी है जिसे कोई रोक नहीं सकता।' उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक इस देश को आम अवाम ने अपने पसीने से सींचा है और वही लोग उठ खड़े होकर इस मुल्क के लोकतंत्र को एक बार फिर महान बनाएंगे।
आयोग पर बढ़ते राजनीतिक दबाव और राष्ट्रव्यापी आंदोलन का परिदृश्य
विपक्ष और नेशनल कॉन्फ्रेंस द्वारा उठाए गए इन सवालों ने चुनाव आयोग के सामने एक बड़ा साख का संकट खड़ा कर दिया है। 'इंडिया' ब्लॉक के प्रमुख घटक दल लगातार मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और वोटर लिस्ट विलोपन मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच की मांग कर रहे हैं। नागरिक समाज और छात्र संगठनों द्वारा विभिन्न राज्यों में चलाए जा रहे 'वोट बचाओ' अभियानों के बीच विपक्षी दलों का तर्क है कि यदि मतदाता सूची की शुचिता ही संदिग्ध हो जाएगी, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की मूल अवधारणा ही ध्वस्त हो जाएगी। दूसरी ओर, सरकार और चुनाव आयोग के समर्थक सूत्रों का कहना है कि वोटर लिस्ट का रिवीजन एक नियमित और वैधानिक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसमें मृत, स्थानांतरित या दोहरे मतदाताओं के नाम नियमानुसार हटाए जाते हैं और किसी भी नागरिक को फॉर्म-6 भरकर दोबारा नाम जुड़वाने का पूरा कानूनी अधिकार प्राप्त है। बहरहाल, फारूक अब्दुल्ला द्वारा नेहरू के ऐतिहासिक निर्णयों से लेकर वर्तमान चयन प्रणाली तक उठाए गए तीखे सवालों ने देश के संवैधानिक विमर्श को एक नई और गर्मागर्म बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।