FATF Report: फर्जी कंपनियां, नकली कारोबार और डिजिटल हवाला... भारतीय जांच एजेंसियों ने खोली काले धन के 'सफेद खेल' की पोल, एफएटीएफ की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फाइनेंसिंग पर निगरानी रखने वाली पेरिस स्थित वैश्विक संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की ताजा वैश्विक रिपोर्ट में काले धन के एक बड़े और सुनियोजित नेटवर्क का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में प्रमुखता से दर्ज किया गया है कि कैसे पेशेवर मनी लॉन्ड्रर्स और संगठित अपराध सिंडिकेट शेल कंपनियों (फर्जी कंपनियों), फर्जी व्यापारिक दस्तावेजों (Trade-Based Money Laundering) और अवैध हवाला चैनलों के जरिए करोड़ों रुपये की काली कमाई को सीमा पार भेजकर सफेद कर रहे हैं। एफएटीएफ ने भारतीय जांच एजेंसियों—विशेष रूप से प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI)—द्वारा उजागर किए गए दो बड़े केस स्टडीज को अपनी रिपोर्ट में शामिल करते हुए भारत की वित्तीय जांच क्षमता की सराहना की है।
केस 1: फर्जी कागजात, अंडर-इनवॉइसिंग और सर्कुलर ट्रेडिंग का खेल
एफएटीएफ की रिपोर्ट में शामिल पहले मामले के अनुसार, भारतीय अधिकारियों ने एक ऐसे जटिल सीमा-पार नेटवर्क को ध्वस्त किया, जो केवल कागजों पर चल रही डमी व शेल कंपनियों के जरिए संचालित हो रहा था। ये फर्जी कंपनियां बेनामी निदेशकों और चुराए गए अथवा फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर बनाई गई थीं।
इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद चौंकाने वाला था:
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गिरोह द्वारा वास्तविक माल का आयात तो किया जाता था, लेकिन कस्टम्स में उसकी कीमत वास्तविक मूल्य से काफी कम (Under-Invoicing) दिखाई जाती थी।
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शेष बची धनराशि को भेजने के लिए भारत में मौजूद घरेलू शेल कंपनियों के जरिए फर्जी आयात बिल (Forged Import Documents) तैयार किए जाते थे और वैध व्यापारिक भुगतान का मुखौटा पहनाकर मोटी रकम विदेश भेज दी जाती थी।
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इस सिंडिकेट ने 'सर्कुलर ट्रेडिंग' (Circular Trade) का भी सहारा लिया। माल को पहले तीसरे देश में स्थित संबंधित कंपनियों को भेजा जाता था, फिर फर्जी व्यावसायिक विवाद (Fake Commercial Disputes) दिखाकर भुगतान रोक दिया जाता था। इसके बाद उसी सामान को आगे उन्हीं के नियंत्रण वाली दूसरी कंपनियों में घुमा दिया जाता था, जिससे पैसे के वास्तविक स्रोत और मंजिल को पूरी तरह छुपा दिया जाता था।
केस 2: अवैध ऑनलाइन गेमिंग और 'डिजिटल हवाला' से विदेशी निवेश का नाटक
दूसरे मामले में भारतीय एजेंसियों ने अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी और गेमिंग प्लेटफॉर्म्स द्वारा फैलाए गए जाल की परतें खोलीं। यह प्लेटफॉर्म क्रिकेट, कार्ड गेम्स और विभिन्न खेलों पर अवैध सट्टेबाजी करवाता था। मुख्य सट्टेबाजी ऐप से वित्तीय सुरागों को अलग रखने के लिए गिरोह ने 'पैनल ऑपरेटर्स' का एक ढीला ढांचा तैयार किया था।
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सट्टेबाजों से पैसे जमा कराने और विजेताओं को भुगतान करने के लिए यूपीआई (UPI), इंटरनेट बैंकिंग, डिजिटल वॉलेट्स और गरीब व अनजान लोगों के नाम पर खोले गए 'म्यूल अकाउंट्स' (Mule Accounts) का इस्तेमाल किया गया।
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जमा हुए काले धन को नकद में बदला गया और फिर पारंपरिक व भूमिगत हवाला नेटवर्क के जरिए भारत से बाहर भेज दिया गया।
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सबसे बड़ा खेल तब हुआ जब इसी हवाला के जरिए विदेश (विशेषकर यूएई) भेजी गई अवैध रकम को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (Foreign Investment / FDI) का जामा पहनाकर दोबारा भारतीय कंपनियों में 'सफेद धन' के रूप में वापस निवेश करा दिया गया।
पारंपरिक हवाला से 'डिजिटल हवाला' की ओर शिफ्ट: एफएटीएफ की चेतावनी
एफएटीएफ के अध्यक्ष जाइल्स थॉमसन (Giles Thomson) ने चेतावनी दी है कि पेशेवर और संगठित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क आज पूरी दुनिया के वित्तीय तंत्र के लिए एक "गंभीर जोखिम गुणक" (Serious Risk Multiplier) बन चुके हैं। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि भूमिगत बैंकिंग और अनरजिस्टर्ड हवाला अब आधुनिक तकनीक के साथ जुड़कर 'डिजिटल हवाला' का रूप ले चुका है।
अब हवाला ऑपरेटर एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स जैसे व्हाट्सएप (WhatsApp) और टेलीग्राम (Telegram) पर रियल-टाइम समन्वय करते हैं। ग्राहकों से भुगतान बैंक ट्रांसफर या इंस्टेंट पेमेंट सिस्टम के जरिए लिया जाता है, जबकि सीमा-पार खातों का अंतिम निपटान क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉइन्स (Stablecoins) जैसी आभासी संपत्तियों के जरिए गुप्त रूप से कर दिया जाता है।
80% से अधिक देशों ने हवाला और शेल कंपनियों को माना सबसे बड़ा खतरा
एफएटीएफ को रिपोर्ट करने वाले 80 फीसदी से अधिक सदस्य देशों ने अनौपचारिक व भूमिगत बैंकिंग को मनी लॉन्ड्रिंग का मुख्य जरिया बताया है। कुछ मामलों में तो ऐसे अवैध सिंडिकेट्स ने महज कुछ महीनों के भीतर 500 मिलियन यूरो (लगभग 4,500 करोड़ रुपये से अधिक) की अवैध रकम को विभिन्न देशों की सीमाओं के पार ट्रांसफर कर दिया। यद्यपि प्रवासी मजदूरों के लिए अनौपचारिक माध्यम सामान्य प्रेषण (Remittance) का जरिया होते हैं, लेकिन बिना लाइसेंस वाले ऐसे नेटवर्क अधिकांश देशों में गैर-कानूनी हैं और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करते हैं।
भारत की कार्रवाई और कड़े नियम: एजेंसियों ने कसी नकेल
भारत की ओर से प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) और बेनामी संपत्ति रोकथाम कानूनों के तहत शेल कंपनियों और फर्जी व्यापार पर लगातार कड़ा प्रहार किया जा रहा है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) और सेबी (SEBI) ने कंपनियों के वास्तविक लाभार्थियों (Ultimate Beneficial Owners - UBOs) की पहचान को अनिवार्य बनाकर डमी कंपनियों के दुरुपयोग पर लगाम कसी है। भारतीय एजेंसियों द्वारा इन जटिल अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पर्दाफाश किए जाने से वैश्विक स्तर पर वित्तीय अपराधों के खिलाफ लड़ाई को नई दिशा मिली है।