ब्रिक्स समिट से ठीक पहले ईरान और यूएई में टकराव, साझा बयान पर लटके पेंच से भारत की बढ़ी कूटनीतिक चिंताएं
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीतिक गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी और संवेदनशील खबर सामने आ रही है। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित होने वाले आगामी ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से ठीक पहले पश्चिम एशिया के दो प्रमुख देशों ईरान और संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। इन दोनों देशों के बीच उपजे मतभेदों के कारण आगामी सम्मेलनों के साझा घोषणापत्र और कूटनीतिक प्रस्तावों पर सहमति बनना मुश्किल होता जा रहा है। ब्रिक्स जैसे बड़े वैश्विक मंच पर यदि मिडिल ईस्ट के ये देश आमने-सामने आ जाते हैं, तो इससे समूह की एकता पर असर पड़ सकता है। चूंकि भारत इस बार वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है और ब्रिक्स बैठकों की मेजबानी व कूटनीतिक संतुलन बनाने की अहम भूमिका निभा रहा है, इसलिए इस भू-राजनीतिक टकराव ने भारतीय रणनीतिकारों और विदेश मंत्रालय की चिंता को काफी बढ़ा दिया है। आइए इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्या है इस विवाद की जड़ और भारत के लिए यह क्यों चिंता का विषय बना हुआ है।
ब्रिक्स सम्मेलन की पृष्ठभूमि और पश्चिम एशिया के नए समीकरण
ब्रिक्स संगठन में हाल के वर्षों में बड़ा विस्तार देखने को मिला है, जिसमें दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ पश्चिम एशिया के कई प्रभावशाली देश भी शामिल हुए हैं। इस समूह का मुख्य उद्देश्य वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार, आपसी व्यापार को बढ़ावा देना और बहुपक्षीय कूटनीति को मजबूत करना है। हाल ही में ईरान और यूएई जैसे देश भी ब्रिक्स परिवार का हिस्सा बने हैं, जिससे इस मंच का रणनीतिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। हालांकि, जैसे-जैसे इस संगठन में सदस्य देशों की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे आपसी क्षेत्रीय और राजनीतिक विवादों के मंच पर उभरने की आशंका भी तेज हो गई है। आगामी शिखर सम्मेलन से पहले ईरान और यूएई के बीच क्षेत्रीय जल क्षेत्रों, रणनीतिक द्वीपों और कूटनीतिक नीतियों को लेकर पुरानी और नई असहमतियां सतह पर आ गई हैं, जिससे सम्मेलनों की रूपरेखा तैयार कर रहे अधिकारियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है।
ईरान और यूएई के बीच क्यों गहराया विवाद और साझा बयान पर क्यों फंसा पेंच
ईरान और यूएई के बीच तनाव का मुख्य कारण खाड़ी क्षेत्र के कुछ रणनीतिक द्वीपों पर नियंत्रण और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। इसके अलावा, पश्चिमी देशों के साथ संबंधों और ऊर्जा आपूर्ति के मुद्दों पर भी दोनों देशों की नीतियां अक्सर एक-दूसरे के विपरीत रहती हैं। जब भी कोई बहुपक्षीय संगठन जैसे ब्रिक्स कोई साझा बयान या घोषणापत्र जारी करता है, तो उसमें सभी सदस्य देशों की सहमति होना अनिवार्य होता है। वर्तमान परिस्थितियों में, ईरान और यूएई एक-दूसरे के प्रस्तावों या बयानों में अपने क्षेत्रीय हितों के खिलाफ किसी भी भाषा को शामिल करने का विरोध कर रहे हैं। इस आंतरिक गतिरोध के चलते साझा बयान के प्रारूप तैयार करने वाली बैठकों में गतिरोध पैदा हो गया है, और कूटनीतिक सूत्र यह बता रहे हैं कि दोनों देशों के अड़ियल रुख के कारण आम सहमति बनना फिलहाल बहुत कठिन नजर आ रहा है।
भारत के लिए इस कूटनीतिक तनाव के क्या हैं मायने और चुनौतियां
भारत के लिए ईरान और यूएई दोनों ही देश बेहद गहरे, रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं। यूएई के साथ भारत के व्यापारिक संबंध, निवेश समझौते और प्रवासी भारतीयों का जुड़ाव बहुत मजबूत है, वहीं ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध और चाबहार बंदरगाह जैसे भू-राजनीतिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में, यदि ब्रिक्स मंच पर इन दोनों देशों के बीच खुला टकराव होता है, तो भारत के लिए एक संतुलित और निष्पक्ष रुख बनाए रखना बहुत बड़ी कूटनीतिक चुनौती बन जाएगा। भारतीय विदेश नीति हमेशा से गुटनिरपेक्षता और सभी देशों के साथ दोतरफा मजबूत रिश्तों के सिद्धांत पर काम करती रही है। इस समिट के सफल आयोजन की जिम्मेदारी निभा रहे भारत के सामने यह बड़ी परीक्षा होगी कि वह इन दोनों देशों के बीच मध्यस्थता या कूटनीतिक सूझबूझ से इस गतिरोध को दूर करे, ताकि ब्रिक्स सम्मेलन की गरिमा और उसकी वैश्विक प्रासंगिकता पूरी तरह सुरक्षित बनी रहे।