Mythology : राधा और कृष्ण की अलौकिक प्रेम गाथा,जानें क्यों तोड़ी थी कान्हा ने अपनी बांसुरी

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News India Live, Digital Desk: Mythology : भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी का प्रेम भारतीय पौराणिक कथाओं में अत्यंत अलौकिक और पवित्र माना जाता है, जो शारीरिक संबंधों से परे शुद्ध भक्ति और समर्पण का प्रतीक है. अक्सर भक्तों के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर राधा रानी की 'मृत्यु' कैसे हुई और उनके बाद कृष्ण ने अपनी प्रिय बांसुरी क्यों तोड़ दी थी. धर्म शास्त्रों में राधा रानी के भौतिक शरीर त्यागने का सीधा वर्णन नहीं मिलता है, बल्कि उनकी कृष्ण में समा जाने की एक गूढ़ अवधारणा प्रचलित है.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी कभी भी विवाह बंधन में नहीं बंधीं, लेकिन उनका प्रेम भगवान कृष्ण के प्रति इतना गहरा था कि वह उनसे सदैव अविभाज्य मानी जाती हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण जब ब्रज छोड़कर मथुरा चले गए, तो राधा रानी ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों को कृष्ण के साथ बिताया. जिस समय उन्होंने अपनी देह त्यागने का निश्चय किया, कृष्ण स्वयं उनके सामने प्रकट हुए. कहा जाता है कि राधा ने कृष्ण से आग्रह किया कि वे अंतिम बार अपनी बांसुरी बजाएं. जब कृष्ण ने अपनी मनमोहक बांसुरी बजाई और राधा ने उस धुन में डूबकर स्वयं को कृष्ण में विलीन कर लिया, तो वह मोक्ष को प्राप्त हुईं. यह मृत्यु नहीं, बल्कि ब्रह्म से जीवात्मा के एकाकार होने का सर्वोच्च अनुभव था.

राधा के विलीन हो जाने के बाद भगवान कृष्ण ने अपनी प्रिय बांसुरी को स्वयं तोड़ दिया. इस बांसुरी को कृष्ण के प्रेम और उनके साथ के प्रतीक के रूप में देखा जाता था. ऐसा माना जाता है कि कृष्ण ने इसे इसलिए तोड़ा क्योंकि राधा ही एकमात्र ऐसी थीं जिन्हें बांसुरी की धुन से परम आनंद मिलता था और उनके बिना बांसुरी का कोई अर्थ नहीं था. उनके चले जाने के बाद कृष्ण ने फिर कभी बांसुरी नहीं बजाई.

इस घटना के बाद कृष्ण ने राधा के सम्मान में स्वयं को आजीवन विवाह के बंधन से दूर रखा, जबकि रुक्मिणी और सत्यभामा जैसी उनकी कई पत्नियाँ थीं. यह उनकी राधा के प्रति असीम और निस्वार्थ प्रेम का परिचायक था.

राधा अष्टमी का पर्व, जो भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है, राधा रानी के जन्म का प्रतीक है. इस दिन भक्त राधा-कृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, और राधा के प्रति कृष्ण के अद्वितीय प्रेम को स्मरण करते हैं. राधा और कृष्ण का यह प्रसंग केवल एक कहानी नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और भक्ति का एक गहन दार्शनिक पाठ है, जो हमें यह सिखाता है कि सच्चा प्रेम केवल देह तक सीमित नहीं होता, बल्कि आत्मा का आत्मा से मिलन होता है.

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