भोजन जो आपके मन को भी बीमार कर देता है: प्रेमानंद महाराज के विचार

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हम सबने अपने बड़ों से सुना है कि "जैसा अन्न, वैसा मन"। यानी हम जैसा भोजन करते हैं, हमारे विचार और हमारा मन भी वैसा ही हो जाता है। आज हम वृन्दावन के श्रद्धेय संत प्रेमानंद जी महाराज के विचारों से जानेंगे कि हमें किस तरह के भोजन से हमेशा बचना चाहिए, जो सिर्फ हमारे शरीर को ही नहीं, बल्कि हमारी आत्मा को भी दूषित कर सकता है।

अक्सर हमारे साथ ऐसा होता है कि खाते-खाते भोजन में बाल या कोई कीड़ा-मकोड़ा दिख जाता है। कई बार हम आलस में या अन्न का अपमान न हो, यह सोचकर उसे निकालकर खाना जारी रखते हैं। लेकिन महाराज जी कहते हैं कि यह एक बहुत बड़ी गलती है।

1. भोजन में बाल निकल आए तो?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, यदि भोजन में बाल निकल आता है, तो वह पूरा भोजन अशुद्ध और जूठा हो जाता है। उसे खाने का मतलब है कि आप अशुद्ध भोजन ग्रहण कर रहे हैं। ऐसा भोजन करने से न सिर्फ आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है, बल्कि यह आपके मन में भी अपवित्रता लाता है। इसलिए, बिना सोचे-समझे उस भोजन को त्याग देना चाहिए।

2. अगर मरी हुई मक्खी या कीड़ा दिख जाए?
बाल की तरह ही, अगर भोजन में कोई मरी हुई मक्खी या कोई और कीड़ा पाया जाता है, तो वह पूरा का पूरा भोजन दूषित हो जाता है। कई लोग कीड़े को निकालकर बाकी भोजन खा लेते हैं, लेकिन यह बिल्कुल गलत है। वह भोजन अब खाने योग्य नहीं रहा, उसे तुरंत हटा देना चाहिए।

3. बासी भोजन (रात का बचा हुआ खाना)
आजकल की भागदौड़ में हम अक्सर रात का बना हुआ खाना सुबह या अगले दिन भी खा लेते हैं। प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि बासी भोजन 'तामसिक' होता है। तामसिक भोजन करने से हमारे शरीर में आलस बढ़ता है, मन में बुरे और नकारात्मक विचार आते हैं, और भगवान के भजन-साधना में भी मन नहीं लगता। यह आपके मन की शांति को भंग कर देता है।

इसलिए, हमेशा कोशिश करें कि ताजा और शुद्ध भोजन ही ग्रहण करें, क्योंकि भोजन सिर्फ हमारे पेट की भूख नहीं मिटाता, यह हमारे मन, विचार और आत्मा को भी ऊर्जा देता है।