रेलवे ट्रैक के नीचे से ये पत्थर हटे तो ऐसे बदल जाएगा पूरा सिस्टम!

रेलवे ट्रैक के नीचे से ये पत्थर हटे तो ऐसे बदल जाएगा पूरा सिस्टम!

ट्रेन से सफर करते समय आपने पटरियों के चारों ओर और उनके नीचे अनगिनत नुकीले पत्थर बिछे देखे होंगे। रेलवे की भाषा में इन्हें 'बैलास्ट' (Ballast) या गिट्टी कहा जाता है। दशकों से इस्तेमाल हो रहे इन पत्थरों का रेलवे के सुरक्षित संचालन में बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह पत्थर भारी-भरकम ट्रेन के वजन को जमीन पर समान रूप से फैलाते हैं, पटरियों को अपनी जगह से खिसकने नहीं देते, पटरियों के बीच घास या पेड़-पौधों को उगने से रोकते हैं और बारिश के पानी को ट्रैक पर जमा होने के बजाय आसानी से नीचे से बहने देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे भारतीय रेलवे 160 से 200 किमी/घंटे की हाई-स्पीड ट्रेनों और बुलेट ट्रेन के दौर में कदम रख रही है, यह पारंपरिक 'गिट्टी वाला ट्रैक' सिस्टम अपनी सीमाओं तक पहुंचने लगा है। ऐसे में पटरियों के नीचे से इन पत्थरों को पूरी तरह हटाने की तैयारी चल रही है।

1. पत्थर हटने पर कैसा होगा नया 'बैलास्टलेस ट्रैक' (Ballastless Track)?

पटरियों के नीचे से पत्थर हटाने के बाद रेलवे जिस नई तकनीक को अपना रही है, उसे बैलास्टलेस ट्रैक (Ballastless Track) या 'स्लैब ट्रैक' (Slab Track) कहा जाता है।

  • कंक्रीट का मजबूत ढांचा: इस सिस्टम में पत्थरों की जगह आरसीसी (RCC) या कंक्रीट की एक समतल और बेहद मजबूत स्लैब बिछाई जाती है। इसी कंक्रीट स्लैब के ऊपर स्टील की पटरियों को सीधे और सटीक एंकर के साथ फिक्स कर दिया जाता है।

  • मेट्रो और हाई-स्पीड कॉरिडोर में इस्तेमाल: भारत में दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों की मेट्रो रेल सेवाओं के साथ-साथ मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट और वापी-सूरत हाई-स्पीड कॉरिडोर में इसी बिना पत्थर वाले स्लैब ट्रैक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

2. बैलास्टलेस ट्रैक से कैसे बदल जाएगा पूरा रेलवे सिस्टम?

यदि पूरे देश में मुख्य रेल मार्गों से गिट्टी हटाकर कंक्रीट स्लैब ट्रैक लगा दिया जाए, तो इससे भारतीय रेलवे की सूरत पूरी तरह बदल जाएगी:

  • ट्रेनों की स्पीड में अप्रत्याशित बढ़ोतरी: पारंपरिक पत्थरों वाले ट्रैक पर जब 160 किमी/घंटे से ज्यादा की रफ्तार से ट्रेन गुजरती है, तो पत्थरों के हिलने और उखड़ने का डर रहता है। बिना पत्थर वाले स्लैब ट्रैक पर ट्रेनें आसानी से 250 से 350 किमी/घंटे की रफ्तार से बिना किसी कंपन (Vibration) के दौड़ सकती हैं।

  • मेंटेनेंस (रखरखाव) का खर्च 90% तक कम: पारंपरिक ट्रैक पर बारिश, धूल और ट्रेन के वजन से पत्थर अपनी जगह से हट जाते हैं, जिन्हें ठीक करने के लिए रेलवे को हर साल भारी भरकम मशीनें और करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। स्लैब ट्रैक बनने के बाद पटरियों के मेंटेनेंस की जरूरत बहुत कम हो जाती है।

  • पटरी उखड़ने और डिरेलमेंट (हादसों) से सुरक्षा: पत्थरों के धंसने या गायब होने से पटरियों का अलाइनमेंट बिगड़ जाता है, जिससे ट्रेन के पटरी से उतरने (Derailment) का खतरा रहता है। कंक्रीट स्लैब पर पटरियां मजबूती से जकड़ी रहती हैं, जिससे रेल दुर्घटनाओं की संभावना न के बराबर रह जाती है।

  • पटरियों पर पानी भरने और गंदगी से मुक्ति: बारिश के मौसम में जलभराव के कारण ट्रेनें ठप्प हो जाती हैं। स्लैब ट्रैक में जल निकासी (Drainage System) का आधुनिक इन-बिल्ट मैकेनिज्म होता है। इसके अलावा, पटरियों की सफाई करना बेहद आसान हो जाता है।

3. भारत में इस बदलाव की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भले ही बैलास्टलेस ट्रैक तकनीक रेलवे का भविष्य है, लेकिन इसे रातों-रात पूरे देश के 68,000 किलोमीटर से लंबे रेल नेटवर्क पर लागू करना बहुत चुनौतीपूर्ण है:

  • शुरुआती लागत (Initial Cost): पारंपरिक गिट्टी वाले ट्रैक की तुलना में कंक्रीट स्लैब ट्रैक बनाने की शुरुआती लागत 2 से 3 गुना अधिक होती है।

  • निर्माण में समय और ट्रैक ब्लॉक: मौजूदा व्यस्त रेल रूटों पर महीनों का ट्रैफिक ब्लॉक लेकर पुरानी पटरियों और पत्थरों को उखाड़कर कंक्रीट ढालना बहुत कठिन काम है।

भविष्य की ओर बढ़ता भारतीय रेलवे

यही कारण है कि भारतीय रेलवे चरणबद्ध तरीके से इस तकनीक को लागू कर रही है। पहले चरण में सभी मुख्य सुरंगों (Tunnels), पुलों (Bridges), बड़े रेलवे स्टेशनों, वंदे भारत/बुलेट ट्रेन रूट्स और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) पर बैलास्टलेस ट्रैक बनाए जा रहे हैं। आने वाले सालों में पटरियों से पत्थरों का हटना भारतीय रेलवे के आधुनिक, सुरक्षित और हाई-स्पीड सफर की एक नई इबारत लिखेगा।

 

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