Village Factory Setup Guide: गांव में फैक्ट्री लगाने से पहले जान लें ये 10 'कड़वे' सच, वरना डूब सकता है आपका निवेश

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नई दिल्ली/लखनऊ। आजकल 'रिवर्स माइग्रेशन' का दौर है। शहर की भीड़भाड़ और नौकरी की चिक-चिक छोड़ युवा अब अपने गांव की माटी में खुद का साम्राज्य यानी 'लघु उद्योग' (Small Scale Industry) खड़ा करना चाहते हैं। गांव में सस्ती जमीन और कम लागत वाला लेबर सुनकर जोश आना लाजमी है, लेकिन जमीन पर उतरने से पहले यह जान लें कि गांव की चुनौतियां शहर के मुकाबले बिल्कुल अलग होती हैं। अगर आप भी अपने खेत या प्लॉट पर फैक्ट्री डालने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो ये 10 पॉइंट्स आपके लिए 'सुरक्षा कवच' का काम करेंगे।

1. बिजली का गणित: सिर्फ मीटर नहीं, 3-Phase कनेक्शन है जरूरी

गांव में सबसे बड़ी बाधा बिजली की कटौती और वोल्टेज है। घरेलू सिंगल फेज मीटर पर औद्योगिक मशीनें नहीं चलतीं।

सच्चाई: आपको कमर्शियल 3-Phase Connection लेना होगा। अगर आपके प्लॉट तक बिजली के खंभे या ट्रांसफार्मर नहीं हैं, तो इसका खर्च आपकी जेब खाली कर सकता है। फैक्ट्री शुरू करने से पहले बिजली विभाग से फिजिबिलिटी चेक जरूर करवाएं।

2. ट्रांसपोर्ट का खर्च: कहीं मुनाफे को न निगल जाए दूरी

गांव में फैक्ट्री लगाने का मतलब है कच्चा माल शहर से आएगा और तैयार माल शहर के बाजार में बिकेगा।

कैलकुलेशन: अगर माल ढोने का किराया ही आपके प्रॉफिट मार्जिन से ज्यादा हो गया, तो बिजनेस फेल हो जाएगा। हमेशा ऐसी जगह चुनें जहां से मुख्य सड़क (Highway) नजदीक हो।

3. स्किल्ड लेबर की कमी: मजदूरी तो मिलेगी, कारीगरी नहीं

गांव में हेल्पर्स की कमी नहीं है, लेकिन मशीन ऑपरेटर या टेक्निकल स्टाफ मिलना टेढ़ी खीर है।

समाधान: या तो आप खुद मशीन चलाने के मास्टर बनें या शहर से आने वाले कारीगर को रहने की सुविधा और शहर से ज्यादा सैलरी देने के लिए तैयार रहें।

4. जमीन का कानूनी पेंच: क्या आपकी जमीन 143 (N.A.) है?

खेत की जमीन पर मशीनें लगाना कानूनी रूप से गलत हो सकता है।

नियम: खेती की जमीन को गैर-कृषि (Non-Agricultural) या आबादी में कन्वर्ट कराना पड़ता है (जिसे कई राज्यों में धारा 143 कहा जाता है)। बिना कन्वर्जन के फैक्ट्री लगाने पर प्रशासन की तरफ से भारी जुर्माना लग सकता है।

5. मशीन रिपेयरिंग और मेंटेनेंस: मैकेनिक का इंतजार पड़ेगा भारी

शहर में मैकेनिक घंटों में आता है, गांव में उसे आने में दिन लग सकते हैं।

टिप: हमेशा ऐसी मशीनरी का चयन करें जिसके स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिलें। साथ ही, छोटी-मोटी खराबी ठीक करना खुद सीखें ताकि प्रोडक्शन हफ्तों तक बंद न रहे।

6. मार्केट की पहुंच: सिर्फ गांव के भरोसे न रहें

गांव के लोगों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) सीमित होती है।

रणनीति: आपका प्रोडक्ट ऐसा होना चाहिए जिसकी डिमांड पास के बड़े कस्बे या थोक बाजार में भी हो। सिर्फ स्थानीय ग्राहकों के भरोसे फैक्ट्री का खर्च निकालना मुश्किल होगा।

7. सड़क और कनेक्टिविटी: बारिश का 'खतरा'

क्या आपकी फैक्ट्री तक लोडिंग ट्रक (14 टायर या 10 टायर) पहुंच सकता है?

सावधानी: गांव के कच्चे रास्ते बारिश में दलदल बन जाते हैं। अगर ट्रक आपकी फैक्ट्री तक नहीं पहुंच पाया, तो सप्लाई चेन टूट जाएगी और ऑर्डर कैंसिल हो सकते हैं।

8. वर्किंग कैपिटल और उधारी का चक्र

ग्रामीण बाजारों में 'उधारी' (Credit) व्यापार का हिस्सा है। अक्सर दुकानदार फसल कटने के बाद पैसा देने का वादा करते हैं।

जरूरी: आपके पास कम से कम 3 से 6 महीने का Working Capital (काम चलाने की पूंजी) एक्स्ट्रा होनी चाहिए, ताकि पेमेंट फंसने पर भी कच्चा माल खरीदना और सैलरी देना न रुके।

9. सरकारी सब्सिडी का लाभ: PMEGP और मुद्रा लोन

अपने पैसे लगाने से पहले सरकारी योजनाओं का फायदा उठाएं।

सुझाव: ग्रामीण क्षेत्रों में फैक्ट्री लगाने पर सरकार PMEGP स्कीम के तहत 25% से 35% तक की सब्सिडी देती है। अपने जिला उद्योग केंद्र (DIC) से संपर्क करें और लोन प्रक्रिया समझें।

10. डिजिटल कनेक्टिविटी: इंटरनेट और पेमेंट

आज का बिजनेस व्हाट्सएप और डिजिटल पेमेंट पर चलता है।

चेक करें: आपकी लोकेशन पर मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की स्पीड कैसी है? अगर UPI पेमेंट या ऑनलाइन ऑर्डर लेने में दिक्कत आएगी, तो आप आधुनिक दौड़ में पिछड़ जाएंगे।