नौकरी को अलविदा कहकर पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने क्यों चुनी राजनीति
भारत में यूपीएससी (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा पास करके आईएएस (IAS) अधिकारी बनना लाखों युवाओं का सपना होता है, क्योंकि इस पद पर रहकर व्यक्ति देश और समाज की सेवा करने के साथ-साथ सर्वोच्च प्रशासनिक शक्तियां भी प्राप्त करता है। लेकिन जब कोई युवा, ईमानदार और तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान ही नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी वीआरएस (VRS) लेकर मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश कर जाता है, तो यह देश भर में चर्चा का विषय बन जाता है। हाल ही में अपनी शानदार प्रशासनिक सेवा और अनूठे कार्यशैली के लिए जानी जाने वाली पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल (Divya Mittal) ने जब प्रशासनिक सेवा को अलविदा कहकर राजनीति के मैदान में उतरने का फैसला किया, तो हर कोई हैरान रह गया। उत्तर प्रदेश कैडर की इस चर्चित महिला आईएएस अधिकारी ने अपने इस बड़े और अप्रत्याशित फैसले के पीछे की असली और चौंकाने वाली वजहों का खुद खुलासा किया है। एक ब्यूरोक्रेट के रूप में आम जनता की सेवा करने से लेकर अब एक राजनेता के तौर पर जनता के बीच सीधे पहुंचने के इस सफर ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने प्रशासनिक नौकरी को छोड़कर राजनीति का दामन क्यों थामा और उनके इस साहसिक निर्णय के पीछे क्या मुख्य उद्देश्य छिपे हैं।
जानिए कौन हैं पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल और क्यों प्रशासनिक सेवा में उनकी कार्यशैली रही है मिसाल
दिव्या मित्तल उत्तर प्रदेश कैडर की एक ऐसी आईएएस अधिकारी रही हैं जिन्होंने अपनी पोस्टिंग के दौरान कई जिलों में डीएम (District Magistrate) के रूप में कार्य करते हुए ऐसे तमाम लीक से हटकर कदम उठाए जिन्हें आज भी लोग याद करते हैं। उनकी गिनती हमेशा से एक सख्त, ईमानदार, विजनरी और जनता के बीच जाकर काम करने वाले अधिकारियों में होती रही है। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास, स्टार्टअप संस्कृति और प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए कई बेहतरीन इनीशिएटिव शुरू किए थे। जब कोई अधिकारी इतने उच्च पद पर रहते हुए समाज के लिए जमीनी स्तर पर इतना सब कुछ कर रहा हो, तो आम जनता और उनके सहयोगियों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी था कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थिति या सोच पैदा हुई कि उन्होंने प्रशासनिक सेवा को बीच में ही छोड़कर राजनीति में आने का मन बना लिया।
ब्यूरोक्रेसी की सीमाएं और जनता के लिए और अधिक बड़े पैमाने पर काम करने की छटपटाहट
एक साक्षात्कार के दौरान जब पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल से यह पूछा गया कि उन्होंने नौकरी को छोड़कर राजनीति क्यों चुनी, तो उन्होंने बहुत ही स्पष्ट और गहराई से भरी बात कही। उन्होंने बताया कि एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में आपके पास काम करने की असीम संभावनाएं तो होती हैं, लेकिन आप हमेशा एक निश्चित दायरे और सरकारी नियमों (Bureaucratic Red Tapism) की सीमाओं के भीतर बंधे होते हैं। कई बार ऐसा होता है कि आप समाज के लिए कुछ बहुत बड़ा और क्रांतिकारी बदलाव करना चाहते हैं, लेकिन फाइलें आगे बढ़ने की प्रक्रिया, राजनीतिक हस्तक्षेप या प्रशासनिक बाधाओं के कारण नीतियां उस तेजी से धरातल पर नहीं उतर पातीं जितनी तेजी से उनकी जरूरत होती है। दिव्या मित्तल का यह मानना था कि यदि आपको समाज की व्यवस्था में आमूल-चूल और स्थायी परिवर्तन लाना है, तो नीति-निर्माण (Policy Making) के उस सर्वोच्च मंच तक पहुंचना जरूरी हो जाता है जहां से असली फैसले लिए जाते हैं। राजनीति उनके लिए केवल सत्ता पाने का जरिया नहीं, बल्कि जनता की सेवा करने का एक ऐसा खुला और व्यापक मंच है जहां वे बिना किसी प्रशासनिक रोक-टोक के सीधे लोगों की आवाज बन सकती हैं।
राजनीति को लेकर लोगों की रूढ़िवादी सोच बदलना और देश के युवाओं को प्रेरित करना
भारत में अक्सर राजनीति को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा जाता है जहां शिक्षित, पेशेवर और ईमानदार लोग आने से कतराते हैं। आम तौर पर राजनीति को लेकर लोगों के मन में भ्रष्टाचार और दागी छवि जैसी नकारात्मक धारणाएं बनी रहती हैं। पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल ने अपने इस कदम से एक बहुत बड़ा संदेश देने की कोशिश की है कि यदि देश की व्यवस्था को सुधारना है, तो अच्छे, पढ़े-लिखे और काबिल लोगों को आगे आकर राजनीति में अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि प्रशासनिक सेवा का अनुभव रखने वाले लोग जब राजनीतिक मंच पर उतरते हैं, तो वे विकास कार्यों को जमीन पर उतारने की प्रशासनिक समझ और जनता की नब्ज को बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं। उनका यह फैसला देश भर के उन युवाओं और महिला प्रोफेशनल्स के लिए एक मिसाल बन गया है जो देश की राजनीति में बदलाव लाना चाहते हैं लेकिन हिचकिचाते हैं।
भविष्य की राजनीतिक योजनाएं और जनता के बीच रहकर विकास कार्यों को गति देने का संकल्प
नौकरी छोड़कर राजनीति में कदम रखने के बाद अब पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल पूरी तरह से जनता के बीच सक्रिय नजर आ रही हैं। वे गांवों, कस्बों और शहरों में जाकर लोगों की समस्याएं सुन रही हैं और एक एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में अपने अनुभवों का इस्तेमाल करके उन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकालने का प्रयास कर रही हैं। उनके इस राजनीतिक सफर को लेकर जानकारों का यह मानना है कि प्रशासनिक दक्षता और जनसंपर्क का यह अनूठा मेल आने वाले समय में राजनीतिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव ला सकता है। हालांकि राजनीति की राह उतनी आसान नहीं होती जितनी बाहर से दिखती है, लेकिन दिव्या मित्तल का मजबूत आत्मविश्वास और प्रशासनिक अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हो रहा है।
निष्कर्ष: प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक इच्छाशक्ति का एक नया संगम
संक्षेप में कहा जाए तो पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल द्वारा नौकरी को अलविदा कहकर राजनीति चुनने का फैसला भारतीय लोकतंत्र में एक नई दिशा और सोच को दर्शाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि अब देश के सबसे काबिल और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी रूढ़िवादी लीक से हटकर कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिससे सीधे तौर पर समाज का भला हो सके। उनकी यह कहानी आने वाले समय में कई युवाओं को प्रेरित करेगी कि वे देश के भविष्य को आकार देने में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएं।