Medanta Medical Negligence: मेदांता अस्पताल के डॉक्टरों की बड़ी लापरवाही पर सीएम योगी सख्त, गलत सर्जरी और भारी-भरकम बिल वसूली के आरोपों की उच्च स्तरीय जांच शुरू

Medanta Medical Negligence: मेदांता अस्पताल के डॉक्टरों की बड़ी लापरवाही पर सीएम योगी सख्त, गलत सर्जरी और भारी-भरकम बिल वसूली के आरोपों की उच्च स्तरीय जांच शुरू

लखनऊ/गुरुग्राम। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और दिल्ली-एनसीआर के गुरुग्राम में स्थित प्रतिष्ठित मेदांता अस्पताल (Medanta Hospital) एक बार फिर गंभीर विवादों के घेरे में आ गया है। एक पीड़ित मरीज के उपचार में हुई भयंकर लापरवाही (Medical Negligence) और अस्पताल प्रबंधन द्वारा की जा रही कथित आर्थिक उगाही का एक बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि डॉक्टरों ने इलाज के दौरान घोर लापरवाही बरतते हुए वास्तविक घाव वाले स्थान को छोड़कर उससे करीब 6 सेंटीमीटर दूर सर्जरी कर दी। इस गलत ऑपरेशन के कारण मरीज के घाव से लगातार मवाद (Pus) बह रहा है और उसकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है। इस मामले में संज्ञान लेते हुए माननीय मुख्यमंत्री जी ने डॉक्टरों की मनमानी के खिलाफ सख्त रुख अख्तियार करते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।

घाव कहीं और, ऑपरेशन कहीं और: डॉक्टरों पर अनदेखी का आरोप

मरीज के परिजनों द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, मेदांता के डॉक्टरों को जब प्रभावित हिस्से से लगातार बहते मवाद को दिखाया गया, तो उन्होंने उसे पूरी तरह इग्नोर कर दिया और 'बाद में देखने' की बात कहकर टालते रहे। जब पीड़ित परिवार ने इस गंभीर लापरवाही की लिखित शिकायत मेल के माध्यम से गुरुग्राम और लखनऊ के आला अधिकारियों व शीर्ष प्रबंधन से की, तो लंबे समय तक उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। काफी दबाव के बाद अस्पताल प्रशासन ने एक बोर्ड मीटिंग बुलाई, जिसमें डॉक्टरों ने अपनी तकनीकी गलती स्वीकार करने के बजाय तीमारदारों के सामने अपने पद और रसूख की धौंस दिखाना शुरू कर दिया।

सरकारी नौकरी छोड़ प्राइवेट में आने की धौंस और बिलिंग का खेल

बोर्ड मीटिंग के दौरान मेदांता के वरिष्ठ डॉक्टर अमित अग्रवाल ने कथित तौर पर यह दलील दी कि वे पीजीआई (PGI) की 5 साल की सरकारी नौकरी छोड़कर यहां आए हैं। वहीं, डॉ. उमा प्रधान ने भी डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल (RML) की प्रतिष्ठित जॉब छोड़ने का हवाला दिया। पीड़ित पक्ष का सवाल है कि यदि डॉक्टर यहां केवल इलाज करने आए हैं, तो वे अपनी कमियों को छुपाने के लिए फाइलों में हेरफेर और लगातार बिल पर बिल क्यों बनाए जा रहे हैं? परिजनों का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन द्वारा डॉक्टरों को हर महीने एक निश्चित वित्तीय राशि का टारगेट दिया जाता है, जिसे पूरा करने के लिए मरीजों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। डॉक्टरों ने इस बीमारी के लिए डेढ़ से दो साल तक लगातार महंगी ड्रेसिंग कराने की बात कही है, जिसका भारी-भरकम बजट एक मध्यमवर्गीय या गरीब परिवार के पूरी तरह बाहर है।

मुख्यमंत्री के जांच आदेश और सेकंड ओपिनियन में खुली पोल

इस मामले के तूल पकड़ने के बाद मेदांता के चिकित्सा निदेशक डॉ. राकेश कपूर ने पीड़ित परिवार को किसी अन्य बाहरी डॉक्टर से सेकंड ओपिनियन (Second Opinion) लेने की सलाह दी थी। इसके बाद जब परिजनों ने अन्य विशेषज्ञ सर्जनों से परामर्श किया, तो डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि इलाज पूरी तरह गलत हुआ है। चिकित्सा नियमों के अनुसार उपचार घाव वाली जगह पर ही होना चाहिए था, न कि उससे दूर। बाहरी डॉक्टरों ने मरीज की जान बचाने के लिए इस गलत सर्जरी को दोबारा ऑपरेट (Re-operate) करने की जरूरत बताई है। अस्पताल के इस रवैये और पुख्ता सबूतों के आधार पर माननीय मुख्यमंत्री जी ने जांच के कड़े निर्देश दिए हैं, जिससे अब दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद है।

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