लखनऊ पुलिस लाइन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किस प्रकार धूमधाम से मनाई श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

लखनऊ पुलिस लाइन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किस प्रकार धूमधाम से मनाई श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित पुलिस लाइन का परिसर इस साल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के पावन अवसर पर एक अलौकिक और भव्य आध्यात्मिक केंद्र में तब्दील हो गया था, जहाँ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस पावन और पारंपरिक पर्व पर मुख्यमंत्री ने पुलिस लाइन में स्थापित भगवान कृष्ण के दरबार में पहुंचकर पूरे विधि-विधान, मंत्रोच्चार और श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना की तथा प्रदेशवासियों के सुख, समृद्धि और शांति की कामना की। जैसे ही मुख्यमंत्री ने भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के समक्ष दीप प्रज्वलित किया, पूरा पंडाल 'हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की' और 'जय श्रीकृष्ण' के गगनभेदी नारों से गूंज उठा। इस भव्य आयोजन में राज्य के कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अमले के दिग्गज और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी अपने परिवारों के साथ शामिल हुए, जिससे उत्सव का माहौल और अधिक उमंग से भर गया। पुलिस लाइन के इस पारंपरिक उत्सव को देखने के लिए शहरभर से आए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा गया और सुरक्षा के बेहद चाक-चौबंद इंतजामों के बीच इस महान पर्व को पूरी गरिमा के साथ संपन्न कराया गया।

'आक्रांता मंदिर तोड़ सकते हैं, सनातन आस्था को छू नहीं सकते' - सीएम योगी के इस ऐतिहासिक बयान के क्या हैं गहरे मायने?

जन्मोत्सव के इस पावन मंच से अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए एक ऐसा अत्यंत प्रभावशाली और वैचारिक संदेश दिया जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इतिहास में कई विदेशी आक्रांता और क्रूर शासक आए जिन्होंने भारत की सनातन संस्कृति को मिटाने और हमारे प्राचीन मंदिरों को खंडित करने का कुत्सित प्रयास किया, लेकिन वे केवल पत्थरों और ईंटों से बने ढांचों को ही नुकसान पहुंचा सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी ताकत इस देश की अटूट सनातन आस्था, मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को कभी भी छू नहीं सकती है, क्योंकि हमारी आस्था भौतिक ईंट-पत्थरों से नहीं बल्कि भगवान के प्रति हमारी अगाध भक्ति और आत्मिक विश्वास से जुड़ी हुई है। उनके इस ओजस्वी और विचारोत्तेजक बयान ने वहां मौजूद सभी लोगों के भीतर राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गौरव की भावना को और अधिक प्रदीप्त कर दिया, जिसे सुनकर पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।

भगवान श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन, गीता के उपदेशों और आज के आधुनिक समाज में उनकी प्रासंगिकता पर क्या बोले मुख्यमंत्री?

अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भगवान श्रीकृष्ण के संपूर्ण जीवन चरित्र, द्वापर युग की लीलाओं और श्रीमद्भगवद्गीता के अमर उपदेशों को आज के आधुनिक समाज के लिए एक अचूक मार्गदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण ने हर युग में अन्याय, अधर्म और असत्य के खिलाफ डटकर मुकाबला करने का जो संदेश दिया है, वह मानवता के कल्याण का सबसे बड़ा माध्यम है। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिए गए गीता के ज्ञान का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जब-जब समाज में संकट के बादल मंडराते हैं और स्वार्थी तत्व मानवता को कुचलने का प्रयास करते हैं, तब-तब भगवान के बताए गए कर्तव्य और कर्म के सिद्धांत हमें सही रास्ता दिखाने का कार्य करते हैं। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे भगवान कृष्ण की बुद्धिमत्ता, उनके संयम और उनके नेतृत्व कौशल को अपने जीवन में अपनाएं ताकि वे देश और समाज के निर्माण में अपनी एक सार्थक और सकारात्मक भूमिका निभा सकें।

उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और पर्व-त्योहारों के संरक्षण को लेकर सरकार की क्या रही है दूरदर्शी सोच?

जब से उत्तर प्रदेश की कमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों में आई है, तब से राज्य में हर सनातन और पारंपरिक पर्व—चाहे वह श्री कृष्ण जन्माष्टमी हो, दीपावली हो, रामनवमी हो या होली—को एक राजकीय और भव्य स्वरूप में मनाने की एक नई और शानदार परंपरा शुरू हुई है। सरकार का यह स्पष्ट मानना है कि जिस राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत इतनी समृद्ध हो, वहाँ के पर्वों को इस तरह से आयोजित किया जाना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ी अपनी जड़ों और संस्कृति पर गर्व महसूस कर सके। पुलिस थानों, जेलों और पुलिस लाइनों में बड़े पैमाने पर मनाए जाने वाले जन्माष्टमी के इन आयोजनों से पुलिस बल और आम जनता के बीच की दूरियां कम होती हैं तथा समाज में एक सकारात्मक व आत्मीय संदेश जाता है। इस प्रकार के भव्य और अनुशासित आयोजनों ने उत्तर प्रदेश की छवि को एक ऐसे राज्य के रूप में स्थापित किया है जहाँ आधुनिक विकास के साथ-साथ अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं का भी पूरी निष्ठा के साथ सम्मान और संरक्षण किया जाता है।