उत्तर प्रदेश में पूरी तरह जंगलराज कायम': बदायूं हिरासत मौत पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय का सरकार पर तीखा हमला
उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले से एक बेहद दर्दनाक, सनसनीखेज और पुलिस तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया है. बदायूं में पुलिस हिरासत के दौरान एक दलित युवक की संदिग्ध और दर्दनाक मौत के बाद से इलाके में भारी तनाव का माहौल बना हुआ है, और इस मामले ने अब तूल पकड़ते हुए एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है. घटना की गंभीरता को भांपते हुए उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अजय राय ने तुरंत बदायूं का दौरा किया और पीड़ित परिवार से मुलाकात कर उनका दर्द बांटा. इसके बाद अजय राय ने प्रदेश की मौजूदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार पर सीधा और बेहद तीखा हमला बोलते हुए यह आरोप लगाया कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं बची है और यहां पूरी तरह से "जंगलराज" कायम हो चुका है. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने पुलिस कस्टडी में हुई इस मौत को सीधे तौर पर एक सोची-सशमी हत्या करार देते हुए कहा कि सत्ता के संरक्षण में दलितों और कमजोर वर्ग के लोगों पर लगातार अत्याचार बढ़ रहे हैं. इस हाई-प्रोफाइल राजनीतिक दौरे और तीखे बयानों के बाद से प्रशासनिक गलियारों से लेकर पुलिस मुख्यालय तक हड़कंप मच गया है, तथा हर कोई इस संवेदनशील मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहा है.
बदायूं थाने में आखिर क्या हुआ था, हिरासत में युवक की मौत का पूरा मामला
यह पूरा वीभत्स मामला बदायूं जिले के एक स्थानीय पुलिस थाने का है, जहाँ पुलिस द्वारा पूछताछ के नाम पर उठाए गए एक दलित युवक की अचानक तबीयत बिगड़ने और फिर उसकी संदेहास्पद परिस्थितियों में मौत हो जाने की बात सामने आई है. मृतक युवक के परिजनों और स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस थाने के भीतर उस पर अमानवीय तरीके से थर्ड डिग्री टॉर्चर का इस्तेमाल किया गया, जिसके कारण उसकी हालत गंभीर हो गई और उसने दम तोड़ दिया. परिजनों का यह भी कहना है कि पुलिस ने इस घटना को छुपाने और लीपापोती करने के लिए पहले तो इसे आत्महत्या या प्राकृतिक मौत का रूप देने की कोशिश की, लेकिन जब स्थानीय लोगों और दलित संगठनों को इस बात की भनक लगी तो थाने के बाहर भारी हंगामा शुरू हो गया. पुलिस अधिकारियों का इस मामले में शुरुआती रटा-रया बयान यह था कि युवक को कुछ मामलों में पूछताछ के लिए लाया गया था और थाने में अचानक उसकी तबीयत खराब होने पर उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. लेकिन इस थ्योरी पर न तो मृतक के परिवार वाले भरोसा कर रहे हैं और न ही विपक्षी दल, क्योंकि थाने के अंदर इस तरह की घटनाएं लगातार पुलिस की कार्यप्रणाली, मानवाधिकारों के हनन और कानून के शासन की धज्जियां उड़ाती हुई साफ नजर आती हैं.
अजय राय ने सरकार को घेरा, कहा- भाजपा राज में दलितों और पिछड़ों का जीना हुआ मुहाल
बदायूं पहुंचकर पीड़ित शोषित परिवार को सांत्वना देने और न्याय दिलाने का भरोसा जताने के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने मीडिया और पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. उन्होंने बेहद आक्रामक तेवर दिखाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में जब से भाजपा की सरकार आई है, तब से दलितों, पिछड़ों और समाज के वंचित वर्ग के लोगों पर पुलिसिया जुल्म और अत्याचारों की बाढ़ आ गई है. अजय राय ने सवाल उठाया कि आखिर क्यों आए दिन थानों और पुलिस चौकियों के भीतर ही आम नागरिकों और विशेषकर दलित युवकों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाती है, जबकि सरकार खुद को सुशासन का दावा करने वाली बताती है. उन्होंने कहा कि पुलिस जो कि जनता की रक्षा करने के लिए होती है, जब वही रक्षक भक्षक बन जाए और थाने कत्लगाह में तब्दील हो जाएं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे. कांग्रेस पार्टी ने इस मामले में न्यायिक जांच की मांग करते हुए यह चेतावनी दी है कि यदि पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द न्याय और आरोपियों को कठोर सजा नहीं मिली, तो कांग्रेस पार्टी पूरे प्रदेश में सड़कों पर उतरकर एक बड़ा जनांदोलन खड़ा करेगी. इस बयान के बाद से प्रदेश की सियासत पूरी तरह गरमा गई है और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है.
उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ रहे पुलिस कस्टडी डेथ के मामलों पर गहरी चिंता
बदायूं की यह घटना कोई पहली ऐसी घटना नहीं है, बल्कि पिछले कुछ समय में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पुलिस हिरासत में मौतों (Custody Deaths) और पुलिस उत्पीड़न के कई चौंकाने वाले मामले प्रकाश में आ चुके हैं. मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का यह लगातार कहना रहा है कि थानों के भीतर सीसीटीवी कैमरों के नियम और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का सख्ती से पालन न किए जाने के कारण पुलिसकर्मी बेखौफ होकर कानून को अपने हाथ में लेते हैं. जब तक पुलिस विभाग के भीतर गलत काम करने वाले अधिकारियों और जवानों के खिलाफ त्वरित, कठोर और अनुकरणीय कार्रवाई नहीं की जाएगी, तब तक इस तरह की बर्बर घटनाओं पर लगाम लगाना नामुमकिन होगा. बदायूं के इस मामले में भी स्थानीय प्रशासन ने दबाव में आकर कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित तो जरूर किया है, लेकिन परिजनों और राजनीतिक दलों की मांग है कि उन सभी जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करके उन्हें तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए. यह घटना एक बार फिर से इस बात की याद दिलाती है कि देश के सबसे बड़े सूबे में पुलिस सुधार, मानवाधिकारों की रक्षा और कानून के राज को सुनिश्चित करने के लिए अभी भी एक लंबी और कठिन लड़ाई बाकी है, जिसे लड़ने के लिए विपक्ष और जनता दोनों को मुखर होना पड़ेगा.