UP Political Shift : यूपी में जातिगत रैलियां हुईं बैन सपा, बसपा, कांग्रेस का सीक्रेट प्लान क्या है? छोटे दल हुए हैरान
News India Live, Digital Desk: उत्तर प्रदेश की राजनीति (UP Politics) हमेशा से ही गरमागरम मुद्दों और दांव-पेचों के लिए जानी जाती है. हाल ही में, इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के आदेश के बाद और फिर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की मुहर लगने के बाद, राज्य सरकार ने जातिगत रैलियों (Caste Rallies) पर पूरी तरह से रोक लगा दी है. यह फैसला 21 सितंबर, 2025 को एक नोटिफिकेशन के ज़रिए लागू किया गया है पहले चुनाव से पहले या किसी ख़ास मौके पर राजनीतिक दल बड़े पैमाने पर जाति के नाम पर रैलियाँ करते थे, जिनमें एक समुदाय के लोगों को लामबंद करने की कोशिश की जाती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा. इस कदम का मकसद समाज में जातिवाद को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाना और राष्ट्रीय एकता (national unity) व सार्वजनिक व्यवस्था (public order) को मजबूत करना है
यह प्रतिबंध उन राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आया है जो लंबे समय से जाति आधारित वोटों पर निर्भर करते रहे हैं, जैसे कि समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party - SP) और बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party - BSP). अब उन्हें अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने पड़ रहे हैं. सूत्रों की मानें तो, SP, BSP और यहाँ तक कि कांग्रेस (Congress) जैसे बड़े दल भी अब अपनी पुरानी शैली छोड़कर जनता तक पहुँचने के नए रास्ते तलाश रहे हैं[3]. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सपा ने अपनी पहले से तय 'गुर्जर चौपालों' का नाम बदलकर अब 'पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक) चौपाल' कर दिया है. इससे यह साफ है कि दल प्रतिबंधों का पालन करते हुए भी अपने कोर वोटर्स से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं
लेकिन, इस फैसले से सबसे ज़्यादा मुश्किल में छोटे दल हैं, जिनकी राजनीति सीधे तौर पर किसी एक जाति समुदाय की पहचान पर टिकी होती है. निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) और अपना दल जैसे दलों के लिए बिना जातिगत रैलियों के अपने समर्थकों को इकट्ठा करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है. इन पार्टियों को अब समझ नहीं आ रहा है कि वे इस नए सियासी माहौल में अपना अस्तित्व कैसे बचाएं और कैसे अपना प्रभाव बनाए रखें. इस प्रतिबंध से इन पार्टियों के लिए अपने वोटबैंक को एकजुट रख पाना और भी कठिन हो गया है यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि यह प्रतिबंध उत्तर प्रदेश की सियासत की दिशा कैसे बदलता है और क्या दल वाकई में जाति के दायरे से बाहर निकलकर समाज के सभी वर्गों तक पहुँचने के नए तरीके अपनाते हैं.