रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) में पेश किए गए एक नए प्रस्ताव पर अमेरिका और रूस एक साथ खड़े नजर आए। यह पहली बार हुआ जब अमेरिका ने यूक्रेन के प्रस्ताव को रोकने की कोशिश की, जबकि यूरोपीय देशों और G7 (अमेरिका को छोड़कर) ने इसे पारित करने के लिए समर्थन दिया।
इस प्रस्ताव में यूक्रेन में जारी युद्ध समाप्त करने, रूस की सैन्य वापसी और शांतिपूर्ण समाधान की मांग की गई थी। हालांकि, अमेरिका समेत 18 देशों ने इसके खिलाफ मतदान किया, जबकि भारत और चीन सहित 65 देशों ने मतदान से दूरी बना ली।
UN प्रस्ताव पर मतदान का नतीजा
- 93 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। इनमें जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और G7 के अन्य देश (अमेरिका को छोड़कर) शामिल थे।
- 18 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया, जिनमें अमेरिका, रूस, इजरायल और हंगरी शामिल हैं।
- भारत, चीन, ब्राजील समेत 65 देशों ने वोटिंग में भाग नहीं लिया।
अमेरिका की बदली रणनीति: यूरोपीय देशों से अलग रुख
रूस-यूक्रेन युद्ध के तीन सालों में यह पहला मौका था जब अमेरिका ने यूरोपीय देशों से अलग रुख अपनाया। इससे पहले, वॉशिंगटन हमेशा यूरोप के साथ खड़ा नजर आता था, लेकिन इस बार उसने यूक्रेन के प्रस्ताव को रोकने का प्रयास किया।
यह बदलाव अमेरिकी विदेश नीति में एक नए रुख और रणनीति की ओर इशारा करता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अब यूरोपीय सहयोगियों से थोड़ा अलग दृष्टिकोण अपना रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का रुख: रूस से तत्काल सैन्य वापसी की मांग
इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने रूस से यूक्रेन से अपनी सेना तुरंत हटाने की मांग की।
- 193 सदस्यीय महासभा में 93 देशों ने समर्थन दिया।
- प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता, लेकिन इसे वैश्विक जनमत का संकेतक माना जाता है।
- इससे पहले के प्रस्तावों में 140 से अधिक देशों ने रूस की निंदा की थी और चार यूक्रेनी क्षेत्रों से उसकी सेना हटाने की मांग की थी।
भारत और चीन ने फिर अपनाई ‘तटस्थ नीति’
भारत और चीन ने इस प्रस्ताव पर कोई वोट नहीं डाला, जिससे यह साफ हो गया कि दोनों देश अब भी यूक्रेन संकट पर तटस्थ नीति अपनाए हुए हैं। भारत लगातार रूस और पश्चिमी देशों के बीच बैलेंस बनाए रखने की रणनीति पर चल रहा है, जबकि चीन भी रूस के साथ अपने संबंधों को बिगाड़ना नहीं चाहता।
क्या अमेरिका-यूरोप के बीच बढ़ रहा है मतभेद?
अमेरिका का इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देना यूरोपीय देशों के लिए एक झटका माना जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन अब रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अपने सहयोगियों से थोड़ा अलग रुख अपना सकता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह सिर्फ एक अस्थायी रणनीतिक कदम था या अमेरिका और यूरोप के रिश्तों में वास्तविक दरार की शुरुआत।